शंकर शाह-रघुनाथ शाह के बलिदान से प्रेरणा: जल, जंगल, जमीन और स्वाभिमान के संघर्ष की अमर विरासत
1857 के संग्राम से आज के आदिवासी अधिकारों तक—स्वतंत्रता, स्वायत्तता और सम्मान की ऐतिहासिक यात्रा पर विशेष आलेख
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दैनिक रेवांचल टाइम्स। 1857 से 1947 तक देश की स्वतंत्रता के लिए आदिवासी नेताओं द्वारा किए गए बलिदानों का एक क्रांतिकारी इतिहास रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल बड़े शहरों, राजधानियों और राजनीतिक नेतृत्व के संघर्ष का इतिहास नहीं है, बल्कि उन जंगलों, पहाड़ों और गांवों में लड़ी गई असंख्य लड़ाइयों का भी इतिहास है, जहां आदिवासी समुदायों ने अपनी जमीन, जंगल, संस्कृति, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया।
आदिवासी समाज ने औपनिवेशिक शासन को केवल राजनीतिक सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि अपनी पारंपरिक जीवन-पद्धति, सामुदायिक संसाधनों और स्वायत्तता पर हमले के रूप में देखा और उसका प्रतिरोध किया। इस दृष्टि से आदिवासी सेनानियों का बलिदान केवल वीरता की घटनाएं नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन, सामुदायिक स्वायत्तता और सम्मान के लिए संघर्ष की ऐतिहासिक विरासत है।
शंकर शाह और रघुनाथ शाह: 1857 के संघर्ष में जबलपुर की अमर गाथा
राजा शंकर शाह और उनके पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह 1857 के विद्रोह के दौरान जबलपुर क्षेत्र में ब्रिटिश शासन के विरोध से जुड़े प्रमुख नामों में गिने जाते हैं। लेखक के अनुसार दोनों ने ब्रिटिश शासन की नीतियों के विरुद्ध स्थानीय स्तर पर प्रतिरोध को संगठित करने का प्रयास किया।
लेख में उल्लेख है कि अंग्रेजों को उनकी गतिविधियों की जानकारी मिलने के बाद 14 सितंबर 1857 को उन्हें गिरफ्तार किया गया और 18 सितंबर 1857 को जबलपुर में दोनों पिता-पुत्र को तोप से उड़ाकर मृत्युदंड दिया गया।
रानी फूलकुंवर: प्रतिरोध में महिलाओं की भूमिका
लेख में रानी फूलकुंवर के संघर्ष का भी उल्लेख किया गया है। लेखक के अनुसार शंकर शाह की मृत्यु के बाद उन्होंने औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। उनकी गाथा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि आदिवासी प्रतिरोध केवल पुरुष योद्धाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि महिलाओं ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल शहरों की कहानी नहीं
आदिवासी संघर्षों का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि उस दौर में आधुनिक राजनीतिक संस्थाएं, व्यापक संचार माध्यम और संगठित आंदोलन के वर्तमान जैसे संसाधन उपलब्ध नहीं थे। इसके बावजूद स्थानीय समाजों ने औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी।
लेखक जवाहर सिंह बुंदेला, मधुकर शाह, ढिल्लों शाह, शिवेंद्र शाह, हिरेंद्र शाह, हिम्मत सिंह गोंड और भाव सिंह गोंड सहित अनेक नायकों का उल्लेख करते हुए तर्क देते हैं कि ऐसे संघर्षों को स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक इतिहास में पर्याप्त स्थान मिलना जरूरी है।
जंगल केवल संसाधन नहीं, जीवन और संस्कृति का आधार
आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पहलू प्राकृतिक संसाधनों और भूमि पर अधिकार का प्रश्न भी था। जंगल आदिवासी समुदायों के लिए केवल लकड़ी अथवा राजस्व का साधन नहीं, बल्कि उनकी अर्थव्यवस्था, संस्कृति, आस्था, सामाजिक व्यवस्था और जीवन का आधार रहे हैं।
लेखक का तर्क है कि आदिवासी विद्रोहों को केवल स्थानीय घटनाओं के रूप में देखने के बजाय स्वाधिकार, संसाधनों पर नियंत्रण और सामुदायिक स्वायत्तता के व्यापक संघर्ष के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
आजादी के बाद भी अधिकारों का सवाल
आलेख स्वतंत्रता के बाद आदिवासी समुदायों की स्थिति पर भी सवाल उठाता है। लेखक का मत है कि जिन समुदायों ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध अपनी भूमि और जंगलों की रक्षा के लिए संघर्ष किया, उन्हें स्वतंत्र भारत में भी जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ा।
संविधान सभा में प्रतिनिधित्व, भूमि एवं वन कानूनों की निरंतरता और सामुदायिक अधिकारों के प्रश्न पर लेखक आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। ये आलेख में व्यक्त लेखक के विचार हैं और संबंधित कानूनी-ऐतिहासिक पहलुओं का मूल्यांकन अलग-अलग स्रोतों और दृष्टिकोणों से किया जा सकता है।
भाषा, संस्कृति और पहचान बचाने की चुनौती
लेखक के अनुसार आज आदिवासी समुदायों के सामने भाषा और बोलियों के संरक्षण, आजीविका, पलायन, सांस्कृतिक पहचान तथा प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े कई प्रश्न मौजूद हैं। विकास परियोजनाओं और पर्यावरणीय बदलावों का प्रभाव भी पारंपरिक जीवन-पद्धतियों पर पड़ता है।
ऐसे समय में राजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह, रानी फूलकुंवर और अन्य आदिवासी नायकों की स्मृति केवल श्रद्धांजलि का विषय नहीं रह जाती, बल्कि यह स्वतंत्रता, अधिकार और गरिमा के अर्थ पर विचार करने का अवसर भी बनती है।
राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह की शहादत से लेकर वर्तमान के आदिवासी अधिकार आंदोलनों तक यह विमर्श बताता है कि जल, जंगल, जमीन, पहचान और स्वाभिमान से जुड़े प्रश्न भारतीय इतिहास की एक लंबी धारा का हिस्सा रहे हैं।
आदिवासी बलिदान का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की परिधि का इतिहास नहीं, बल्कि उसके व्यापक जनाधार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन सेनानियों की शहादत को उचित ऐतिहासिक स्थान देना अतीत को समझने के साथ वर्तमान में आदिवासी समाज के अधिकारों, गरिमा और अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों को समझने की भी एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ
