मध्य प्रदेश के शोध ने दिलाई बांस को नई पहचान, अब टोकरी नहीं बिस्किट-नूडल्स बनेगा आय का जरिया
डिंडोरी के डॉ. विकास जैन ने बांस कोंपल पर किया शोध; बिस्किट, नमकीन और इंस्टेंट नूडल्स जैसे उत्पादों के जरिए पोषण और जनजातीय आजीविका की नई संभावनाएं
बांस और जनजातीय समाज का सदियों पुराना रिश्ता
बांस और जनजातीय समाज का रिश्ता सदियों पुराना है। गोंड, बैगा, भारिया, उरांव और कंवर समुदायों के पारंपरिक जीवन में बांस का व्यापक उपयोग होता आया है। घर की दीवारों से लेकर मछली पकड़ने की टोकनी, तीर-कमान, बांसुरी और दैनिक उपयोग की अनेक वस्तुएं बांस से बनाई जाती रही हैं।
बस्तर का बांस शिल्प अपनी अलग पहचान रखता है। वहीं हरेली और करमा जैसे पारंपरिक त्योहारों एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में भी बांस का विशेष महत्व रहा है।
प्लास्टिक और आधुनिक उत्पादों के बढ़ते इस्तेमाल से पारंपरिक बांस शिल्प के सामने चुनौतियां आई हैं। अब बांस की खाद्य कोंपलों के मूल्य संवर्धन को आजीविका के एक नए विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
क्या है डॉ. विकास जैन का शोध?
डिंडोरी के शोधकर्ता डॉ. विकास जैन ने मध्य प्रदेश के डिंडोरी, मंडला, बालाघाट और शहडोल क्षेत्र में मिलने वाली खाने योग्य बांस प्रजाति की कोंपलों पर अध्ययन किया है। जनजातीय समुदायों में लंबे समय से सब्जी के रूप में इस्तेमाल होने वाली बांस कोंपल यानी करिल को पाउडर और पेस्ट के रूप में तैयार कर विभिन्न खाद्य उत्पादों में प्रयोग किया गया।
- बांस शूट फोर्टिफाइड बिस्किट
- क्रिस्पी नमकीन
- इंस्टेंट नूडल्स
अध्ययन में बांस की कोंपल को अलग-अलग तरीकों से प्रोसेस कर खाद्य उत्पादों में इस्तेमाल किया गया। बांस शूट में प्राकृतिक रूप से मौजूद cyanogenic compounds के कारण इसे उचित तरीके से प्रोसेस और पकाना आवश्यक होता है। इसलिए सुरक्षित खाद्य उपयोग के लिए वैज्ञानिक प्रसंस्करण महत्वपूर्ण है।
पोषण पर भी शोध का फोकस
डॉ. जैन के शोध में बांस की कोंपलों के पोषण और फाइटोकेमिकल गुणों का भी अध्ययन किया गया। शोध में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन-सी और अमीनो एसिड जैसे पोषक घटकों की मौजूदगी पर विशेष ध्यान दिया गया है।
शोध में बांस कोंपल के पाउडर और पेस्ट को अलग-अलग अनुपात में खाद्य उत्पादों में शामिल कर उनके स्वाद, स्वीकार्यता और पोषण संबंधी गुणों का अध्ययन किया गया। ऐसे प्रयोग स्थानीय वन उत्पादों के मूल्य संवर्धन की दिशा में नई संभावनाएं खोल सकते हैं।
कच्चे बांस शूट की कुछ प्रजातियों में प्राकृतिक cyanogenic compounds हो सकते हैं। इसलिए बांस की कोंपलों को सीधे कच्चा खाने के बजाय सही पहचान और सुरक्षित प्रसंस्करण के बाद ही खाद्य रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
टोकरी और फर्नीचर से आगे—फूड प्रोसेसिंग बन सकती है आय का नया रास्ता
शोध का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जनजातीय क्षेत्रों में आजीविका की संभावनाओं से जुड़ा है। यदि बांस आधारित खाद्य उत्पादों के सुरक्षित प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन की व्यवस्था विकसित होती है तो स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन के नए अवसर बन सकते हैं।
डॉ. जैन का मानना है कि बांस के फर्नीचर और हस्तशिल्प के साथ खाद्य उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण भी जनजातीय युवाओं को दिया जाए तो जंगल से मिलने वाले स्थानीय उत्पाद को बाजार से जोड़कर आय का नया स्रोत विकसित किया जा सकता है।
कुपोषण के खिलाफ उपयोग की संभावना, लेकिन आगे अध्ययन जरूरी
बांस कोंपल के पोषण गुणों को देखते हुए शोधकर्ता इसे पौष्टिक खाद्य उत्पाद विकसित करने की संभावनाओं से जोड़ते हैं। हालांकि कुपोषण जैसी जटिल स्वास्थ्य समस्या के समाधान के रूप में किसी एक खाद्य पदार्थ की प्रभावशीलता स्थापित करने के लिए व्यापक पोषण अध्ययन, मानकीकरण और मानव-आधारित परीक्षण जरूरी होंगे।
विश्व बांस दिवस बांस को केवल हस्तशिल्प या निर्माण सामग्री के रूप में देखने के बजाय उसके बहुआयामी उपयोग पर विचार करने का अवसर है। डिंडोरी से सामने आया यह शोध बताता है कि वैज्ञानिक प्रसंस्करण और स्थानीय उद्यमिता के जरिए बांस की कोंपलें भविष्य में खाद्य उत्पादों और जनजातीय आजीविका के नए विकल्पों का हिस्सा बन सकती हैं।
