पांढुर्णा का गोटमार मेला बना ‘पत्थरों का युद्ध’, दोपहर तक 118 से ज्यादा घायल; किसी का सिर फूटा तो किसी की टूटी हड्डी
दैनिक रेवांचल टाईम्स - पांढुर्णा। पांढुर्णा में शुक्रवार को सदियों पुरानी परंपरा ‘गोटमार मेला’ शुरू होते ही जाम नदी का किनारा पत्थरबाजी के मैदान में तब्दील हो गया। नदी के बीच गाड़े गए पलाश के पेड़ पर लगे झंडे को हासिल करने के लिए पांढुर्णा और सावरगांव पक्ष आमने-सामने आ गए।
दोनों ओर से लगातार पत्थर फेंके जाने के बीच दोपहर 12 बजे तक 118 से अधिक लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई। कई लोगों के सिर और शरीर के अन्य हिस्सों में चोटें आईं।
15 मिनट में 28 लोग घायल, पट्टी बंधवाकर फिर मैदान में लौटे
शुक्रवार सुबह करीब 11 बजे नदी के बीच झंडा स्थापित किए जाने के बाद दोनों ओर से पत्थरबाजी शुरू हो गई। शुरुआती 15 मिनट में ही 28 लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई।
कई खिलाड़ी चोट लगने और सिर पर पट्टी बंधवाने के बाद भी दोबारा मैदान में उतरते दिखाई दिए।
इस दौरान सावरगांव पक्ष के आक्रामक रुख के कारण पांढुर्णा पक्ष के कई खिलाड़ियों को पीछे हटना पड़ा। कुछ लोग पुलिया छोड़कर पीछे जाते भी नजर आए।
बड़ा पत्थर लगने से युवक के पैर की हड्डी टूटी
पांढुर्णा पक्ष के सचिन हाटेकर के पैर में बड़ा पत्थर लगने से गंभीर चोट आई और हड्डी टूटने की जानकारी सामने आई। प्राथमिक उपचार के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया।
7 अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र, 44 डॉक्टर और 22 एंबुलेंस
घायलों के तत्काल उपचार के लिए स्वास्थ्य विभाग ने मेला क्षेत्र में व्यापक इंतजाम किए हैं। आसपास 7 अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र बनाए गए हैं।
- 7 अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र
- 44 डॉक्टरों की टीम
- 22 एंबुलेंस तैनात
- घायलों की मरहम-पट्टी और जरूरत के अनुसार टांके
- गंभीर घायलों को अस्पताल भेजने की व्यवस्था
700 से ज्यादा पुलिसकर्मी, ड्रोन और CCTV से निगरानी
गोटमार मेले को देखते हुए प्रशासन और पुलिस ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। कानून-व्यवस्था संभालने के लिए मेला क्षेत्र में 700 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है।
कैमरों से निगरानी
हवा से नजर
सुरक्षा में तैनात
प्रशासनिक अधिकारी लाउडस्पीकर के जरिए लोगों से लगातार शांति और सावधानी बनाए रखने की अपील कर रहे हैं।
जाम नदी के बीच लगे झंडे के लिए होता है गोटमार
गोटमार मेले में जाम नदी के बीच पलाश का पेड़ लगाकर उस पर झंडा बांधा जाता है। पांढुर्णा और सावरगांव पक्ष के लोग इस झंडे तक पहुंचने और उसे हासिल करने की कोशिश करते हैं। इसी दौरान परंपरागत रूप से दोनों ओर से पत्थर फेंके जाते हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1955 से 2025 के बीच गोटमार के दौरान 13 लोगों की मौत होने की बात कही गई है। इसके बावजूद भाद्रपद मास की पोला अमावस्या के दूसरे दिन यह परंपरा हर वर्ष आयोजित होती है।
आस्था और परंपरा के बीच सुरक्षा की बड़ी चुनौती
गोटमार मेले की ऐतिहासिक परंपरा के बीच हर साल बड़ी संख्या में लोगों का घायल होना प्रशासन और समाज दोनों के सामने सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा करता है। इस बार भी भारी पुलिस बल, डॉक्टरों, एंबुलेंस, CCTV और ड्रोन की व्यवस्था के बावजूद शुरुआती घंटों में ही बड़ी संख्या में लोग घायल हो गए।
