मुख्यधारा की आवाज और हाशिए का संगीत: लता मंगेशकर से भीमगीत तक सामाजिक प्रतिनिधित्व की पड़ताल
लोकप्रियता, सामाजिक प्रतिनिधित्व और आंबेडकरवादी संगीत-संस्कृति के रिश्ते का शोधपरक अध्ययन
अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर
भारतीय संगीत इतिहास में लता मंगेशकर का स्थान असाधारण रहा है। सात दशकों से अधिक लंबे उनके संगीत जीवन और व्यापक लोकप्रियता को स्वीकार करते हुए यह अध्ययन एक अलग सवाल सामने रखता है—क्या किसी कलाकार की अपार लोकप्रियता और समाज के प्रत्येक वंचित वर्ग का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व एक ही बात है?
अध्ययन का केंद्रीय प्रश्न है कि भारतीय लोकप्रिय संगीत की मुख्यधारा में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, जाति-विरोध, दलित आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय की आवाज को कितना स्थान मिला। इसी प्रश्न के साथ लता मंगेशकर के गीत-संसार और आंबेडकरवादी भीमगीत परंपरा को तुलनात्मक दृष्टि से देखा गया है।
किसी कलाकार के गीत करोड़ों लोगों तक पहुंच सकते हैं, लेकिन इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि उसके संगीत में प्रत्येक सामाजिक संघर्ष को समान प्रतिनिधित्व मिला। इसलिए अध्ययन लता मंगेशकर की लोकप्रियता को नकारने के बजाय यह पूछता है कि उनके विशाल गीत-संसार में जाति-विरोधी और आंबेडकरवादी सामाजिक अनुभवों की उपस्थिति कितनी रही।
अध्ययन का महत्वपूर्ण पक्ष आंबेडकरवादी भीमगीत परंपरा है। भीमगीत, बुद्धगीत, शाहिरी, जलसा और अन्य लोक-संगीत रूपों के माध्यम से दलित और आंबेडकरवादी समाज ने समानता, आत्मसम्मान, शिक्षा, गरिमा और जाति-विरोध के विचारों को अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति दी।
शोध में इस परंपरा को केवल मनोरंजन नहीं माना गया है। महाड़ सत्याग्रह, सामाजिक समानता, बौद्ध धम्म, आत्मसम्मान और मुक्ति जैसे विषय गीतों के माध्यम से सामुदायिक स्मृति का हिस्सा बने। इस दृष्टि से भीमगीत हाशिए के समुदायों के वैकल्पिक सांस्कृतिक इतिहास के रूप में भी सामने आते हैं।
लेखक के अध्ययन के अनुसार उपलब्ध सार्वजनिक सामग्री में लता मंगेशकर के किसी स्थापित प्रसिद्ध आंबेडकरवादी या भीमगीत की पुष्टि नहीं होती। कुछ आंबेडकरवादी कलाकारों और वक्ताओं के सार्वजनिक बयानों में यह दावा मिलता है कि उनसे डॉ. आंबेडकर पर गीत गाने का अनुरोध किया गया था, लेकिन ऐसा गीत रिकॉर्ड नहीं हुआ।
अध्ययन स्वयं स्पष्ट करता है कि कथित अनुरोध का मूल पत्र, लता मंगेशकर का स्वयं लिखा उत्तर, प्रमाणित स्टूडियो दस्तावेज अथवा निर्णायक प्राथमिक ऑडियो-वीडियो प्रमाण सामने नहीं है। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना कि उन्होंने जाति के कारण ऐसा गीत गाने से इनकार किया, उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर उचित नहीं होगा।
अध्ययन में वामनदादा कर्डक की आंबेडकरवादी गीत-परंपरा को विशेष महत्व दिया गया है। लेखक के अनुसार उनके गीतों में डॉ. आंबेडकर, बुद्ध, समानता, जाति-विरोध और आत्मसम्मान केंद्रीय विषय रहे और इस परंपरा को बाद की पीढ़ियों के कलाकारों ने भी आगे बढ़ाया।
क्या संगीत में केवल आवाज सुनी जाती है, या यह भी देखा जाना चाहिए कि वह आवाज किस सामाजिक स्थान से आ रही है और किन सामाजिक अनुभवों को अभिव्यक्ति मिल रही है?
शोध इस बात को भी रेखांकित करता है कि यह कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा कि लता मंगेशकर की आवाज केवल किसी एक सामाजिक वर्ग तक सीमित थी। उनकी लोकप्रियता अत्यंत व्यापक थी। इसलिए अधिक सटीक सवाल यह है कि इतनी व्यापक लोकप्रिय आवाज के गीत-संसार में भारत के जाति-विरोधी और आंबेडकरवादी संघर्षों को कितना प्रतिनिधित्व मिला।
लता मंगेशकर को भारत रत्न से सम्मानित किया गया और उनका भारतीय संगीत में योगदान ऐतिहासिक है। लेकिन अध्ययन का तर्क है कि किसी कलाकार को मिला राष्ट्रीय सम्मान और उसके संगीत में अलग-अलग सामाजिक संघर्षों का प्रतिनिधित्व दो स्वतंत्र प्रश्न हैं। इसी तरह किसी कलाकार द्वारा किसी विषय पर गीत न गाना अपने-आप में उस विषय के विरोध का प्रमाण भी नहीं माना जा सकता।
अध्ययन का महत्वपूर्ण निष्कर्ष किसी व्यक्तिगत आरोप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक “अनुपस्थिति” की पड़ताल में है। एक ओर आंबेडकरवादी आंदोलन ने गीतों, शाहिरों, गायन मंडलियों और लोककलाकारों की स्वतंत्र परंपरा विकसित की, वहीं दूसरी ओर मुख्यधारा के लोकप्रिय संगीत में इस सामाजिक अनुभव को कितना स्थान मिला—यह स्वयं एक शोध योग्य प्रश्न है।
इस अध्ययन का उद्देश्य लता मंगेशकर को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक इतिहास से यह पूछना है कि देश के वंचित समुदायों की आवाज, संघर्ष और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को मुख्यधारा में कितना स्थान मिला।
लेखक का निष्कर्ष है कि आज आवश्यकता दलित, आदिवासी, श्रमिक, महिला और अन्य हाशिए के समुदायों की अपनी आवाजों को उनके शब्दों, संगीत और सांस्कृतिक परंपराओं सहित व्यापक राष्ट्रीय सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा बनाने की है।
प्रमोद रंजन — Social and Political Concerns of Lata Mangeshkar: An Ambedkarite Perspective (2022)
Joël Cabalion & Julien Jugand — Bhim Geet and the Ambedkarite Movement (2023)
Rasika Ajotikar — Music and the Politics of Caste and Gender: Women’s Voices of Liberation in Western India (2019)
शोध एवं विचार | संगीत-संस्कृति | सामाजिक प्रतिनिधित्व
