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मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने वन विभाग की पहल, ग्रामीणों को मशरूम उत्पादन से जोड़कर मिलेगा स्वरोजगार


मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने वन विभाग की पहल, ग्रामीणों को मशरूम उत्पादन से जोड़कर मिलेगा स्वरोजगार

परिक्षेत्र खापा में रजमा समिति के सदस्यों को मिला प्रशिक्षण, कम लागत और कम जगह में मशरूम उत्पादन कर आय बढ़ाने के बताए तरीके

दैनिक रेवांचल टाइम्स, खापा। मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को कम करने और वन क्षेत्र से लगे गांवों के ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक आजीविका एवं रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से वन विभाग ने नई पहल की है। परिक्षेत्र खापा अंतर्गत रजमा समिति के सदस्यों के लिए मंगलवार, 8 सितंबर को मशरूम उत्पादन प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।

प्रशिक्षण कार्यक्रम में मास्टर ट्रेनर सुश्री हिमानी उइके ने ग्रामीणों को मशरूम उत्पादन की सरल और आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी। प्रशिक्षण का उद्देश्य ग्रामीणों को ऐसा स्वरोजगार उपलब्ध कराना है, जिसे कम स्थान और अपेक्षाकृत कम लागत में शुरू कर अतिरिक्त आय का स्रोत विकसित किया जा सके।

स्पॉन लगाने से लेकर तापमान और नमी प्रबंधन तक सीखी तकनीक

प्रशिक्षण के दौरान मशरूम उत्पादन के लिए आवश्यक सामग्री, उपयुक्त स्थान के चयन, तापमान एवं नमी के प्रबंधन और मशरूम स्पॉन लगाने की विधि के बारे में विस्तार से बताया गया।

इसके साथ ही उत्पादन के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों, तैयार मशरूम के रख-रखाव, संग्रहण और बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया को भी व्यावहारिक तरीके से समझाया गया।

कम जगह, कम लागत और घर से शुरू हो सकता है स्वरोजगार

ग्रामीणों को बताया गया कि मशरूम उत्पादन के लिए बड़ी जमीन की आवश्यकता नहीं होती। घर अथवा उपलब्ध छोटे स्थान से इसकी शुरुआत की जा सकती है। सही तकनीक और बाजार उपलब्ध होने पर इसे परिवार की अतिरिक्त आय के स्रोत के रूप में विकसित किया जा सकता है।

जंगल पर निर्भरता घटेगी तो वन्यजीवों से टकराव भी होगा कम

वन विभाग की इस पहल के पीछे स्वरोजगार के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने का उद्देश्य भी जुड़ा है। वन क्षेत्रों से लगे कई गांवों में ग्रामीण अपनी आजीविका की विभिन्न जरूरतों के लिए जंगलों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक रोजगार के साधन विकसित होने से वन संसाधनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

वन विभाग का प्रयास है कि ग्रामीणों को गांव में ही आय के साधन उपलब्ध हों। इससे वन क्षेत्रों में अनावश्यक आवागमन कम होने के साथ मानव और वन्यजीवों के आमने-सामने आने की संभावनाओं को भी घटाया जा सकेगा।

मशरूम बिकेगा बाजार में, गांव में बढ़ेगी परिवार की आय

प्रशिक्षण में ग्रामीणों को उत्पादित मशरूम को स्थानीय बाजार में बेचकर नियमित आय का स्रोत विकसित करने की संभावनाओं के बारे में भी जानकारी दी गई। ग्रामीणों से प्रशिक्षण को केवल जानकारी तक सीमित न रखकर इसे स्थायी और लाभकारी स्वरोजगार गतिविधि के रूप में अपनाने का आह्वान किया गया।

ग्रामीणों की संरक्षण में भागीदारी बढ़ाने की कोशिश

आजीविका आधारित गतिविधियों के माध्यम से वन विभाग स्थानीय समुदाय की वन एवं वन्यजीव संरक्षण में सहभागिता को भी मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। विभाग की मंशा है कि वन क्षेत्र से जुड़े ग्रामीण आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनें और संरक्षण की गतिविधियों में सक्रिय भागीदार बनें।

‘संरक्षण के साथ आजीविका’ की ओर कदम

वन और वन्यजीव संरक्षण तभी अधिक प्रभावी हो सकता है जब जंगलों के आसपास रहने वाले समुदायों की आजीविका भी सुरक्षित हो। मशरूम उत्पादन जैसी गतिविधियों के जरिए ग्रामीणों की आय बढ़ाने और जंगल पर उनकी प्रत्यक्ष निर्भरता कम करने की दिशा में यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

लक्ष्य—आत्मनिर्भर गांव, सुरक्षित जंगल और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व

वन विभाग की पहल रोजगार और संरक्षण को एक साथ जोड़ने का प्रयास है। यदि प्रशिक्षण के बाद ग्रामीण स्तर पर उत्पादन, बाजार और निरंतर तकनीकी सहयोग की व्यवस्था मजबूत होती है तो मशरूम उत्पादन स्थानीय परिवारों के लिए आय का साधन बनने के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने की दिशा में भी उपयोगी साबित हो सकता है।


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