इमलीटोला की जर्जर शाला पूछ रही—जिम्मेदारों की नजर में बच्चों की जान की कीमत क्या है?
दीवार गिरने के बाद भी शिक्षा विभाग मौन, जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर भी उठे सवाल
रेवांचल टाइम्स | घुघरी। तहसील मुख्यालय घुघरी की ग्राम पंचायत इमलीटोला स्थित शासकीय प्राथमिक शाला इमलीटोला की जर्जर हालत ने जिले की शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्कूल भवन की दीवार का हिस्सा गिर चुका है और उसका मलबा परिसर में पड़ा है। सवाल यह नहीं कि दीवार क्यों गिरी, सवाल यह है कि दीवार गिरने के बाद भी जिम्मेदारों की आंख क्यों नहीं खुली?
सरकार बच्चों को सुरक्षित भवन और बेहतर शिक्षा का वातावरण देने के दावे करती है, लेकिन इमलीटोला की तस्वीरें इन दावों की हकीकत सामने रखती नजर आ रही हैं। यदि भवन पहले से जर्जर था तो समय रहते मरम्मत या वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? और यदि दीवार गिरने के बाद भी भवन में बच्चों की आवाजाही जारी है तो इसकी जवाबदारी आखिर किस अधिकारी की है?
दुरुस्त स्कूलों पर खर्च, जर्जर स्कूलों की अनदेखी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल जिले के शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से है। जिले में ऐसे कितने स्कूल हैं जहां वास्तविक रूप से मरम्मत की आवश्यकता है और कितने स्कूल ऐसे हैं जिनकी स्थिति अपेक्षाकृत ठीक होने के बावजूद मरम्मत के नाम पर सरकारी राशि खर्च की जा रही है?
यदि जर्जर भवनों का सर्वे और प्राथमिकता तय करने की व्यवस्था मौजूद है, तो फिर इमलीटोला जैसे स्कूल उस प्राथमिकता सूची में कहां हैं?
क्या सरकारी बजट का इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से हो रहा है या फिर कागजों पर मरम्मत और जमीन पर बदहाली का खेल चल रहा है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक तरफ कई विद्यालय मूलभूत मरम्मत और सुरक्षा के लिए तरस रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उन विद्यालयों में भी मरम्मत कार्य स्वीकृत होने की चर्चाएं सामने आती रहती हैं जहां तत्काल ऐसी जरूरत दिखाई नहीं देती। हालांकि इन मामलों में वास्तविक स्थिति की पुष्टि स्वतंत्र तकनीकी जांच और विभागीय अभिलेखों से ही होनी चाहिए।
दीवार गिर गई, अब छत गिरने का इंतजार?
इमलीटोला स्कूल की दीवार गिरना सामान्य घटना मानकर टालना बच्चों की सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ साबित हो सकता है। बारिश के मौसम में जर्जर भवन की स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है।
क्या शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने स्कूल का तकनीकी निरीक्षण कराया?
क्या भवन की सुरक्षा रिपोर्ट तैयार की गई?
क्या बच्चों को सुरक्षित वैकल्पिक कक्ष उपलब्ध कराया गया?
क्या जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचे?
अगर इन सवालों के जवाब नहीं हैं, तो फिर जिले में स्कूल भवनों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
फाइलों में स्कूल सुरक्षित, जमीन पर जर्जर?
सरकारी स्कूलों की मरम्मत और निर्माण के लिए हर वर्ष योजनाएं बनती हैं, बजट जारी होता है और जिम्मेदार विभाग कागजी प्रक्रिया पूरी करता है। लेकिन असली परीक्षा तब होती है जब अधिकारी स्कूल की जमीन पर पहुंचकर भवन की स्थिति देखते हैं।
इमलीटोला का स्कूल यही सवाल पूछ रहा है—क्या निरीक्षण सिर्फ कागजों में होता है?
यदि किसी अधिकारी ने पहले भवन का निरीक्षण किया था तो जर्जर हालत सामने क्यों नहीं आई? और यदि सामने आई थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
जनप्रतिनिधि भी दें जवाब
क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है कि वे क्षेत्र की समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुंचाएं। ऐसे में सवाल है कि क्या किसी जनप्रतिनिधि ने इमलीटोला स्कूल की स्थिति देखी? क्या शिक्षा विभाग से जवाब मांगा गया? क्या जिला प्रशासन को इसकी जानकारी दी गई?
बच्चों की सुरक्षा किसी राजनीतिक दल, विभाग या अधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक प्रशासनिक जिम्मेदारी है।
सरकार पैसा खर्च करे, लेकिन पहले जरूरत देखे
सरकारी धन जनता का धन है। इसलिए जरूरतमंद जर्जर विद्यालयों की अनदेखी और अपेक्षाकृत दुरुस्त भवनों पर अनावश्यक खर्च की किसी भी शिकायत की निष्पक्ष तकनीकी जांच होना जरूरी है।
इमलीटोला स्कूल की दीवार गिर चुकी है। अब जिम्मेदारों को यह तय करना है कि अगली खबर मरम्मत शुरू होने की होगी या किसी बड़े हादसे की।
जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग को चाहिए कि जिले के सभी शासकीय स्कूल भवनों का निष्पक्ष भौतिक एवं तकनीकी सर्वे कराए, जर्जर भवनों की प्राथमिकता सूची सार्वजनिक करे और यह भी स्पष्ट करे कि मरम्मत के लिए किस विद्यालय को कितनी राशि स्वीकृत हुई और उसका उपयोग कहां हुआ।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक दीवार का नहीं है—
सवाल उन मासूम बच्चों की सुरक्षा का है, जिनके हाथों में किताबें होनी चाहिए, जर्जर भवनों का डर नहीं।


