सोमवार को हरतालिका तीज और गणेश स्थापना, मंगलवार को ऋषि पंचमी; जानें शुभ मुहूर्त और दोनों व्रत की कथा
हरतालिका तीज पर भगवान शिव-पार्वती की आराधना का विशेष महत्व; पं. मुकेश जोशी ने बताए गणेश स्थापना के शुभ मुहूर्त
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दैनिक रेवांचल टाइम्स। सोमवार को श्रद्धा और आस्था के साथ हरतालिका तीज व्रत रखा जाएगा। इसी दिन भगवान गणेश की स्थापना भी की जाएगी, जबकि मंगलवार को ऋषि पंचमी व्रत रहेगा। हरतालिका तीज को भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है।
हरतालिका तीज व्रत कथा: शिव को पति रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने की थी कठोर तपस्या
धार्मिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराते हुए हरतालिका तीज व्रत का माहात्म्य बताया। भगवान शिव ने कहा कि पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा तट पर माता पार्वती ने बाल्यावस्था से ही उन्हें पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी।
कथा के अनुसार माता पार्वती ने वर्षों तक कठिन तप किया। उन्होंने अन्न का त्याग किया, मौसम की कठिन परिस्थितियों को सहन किया और अपनी साधना में निरंतर लीन रहीं। उनकी कठिन तपस्या देखकर पिता हिमालय भी चिंतित रहते थे।
भगवान विष्णु से विवाह का प्रस्ताव लेकर पहुंचे नारद
धार्मिक कथा के अनुसार एक दिन देवर्षि नारद पर्वतराज हिमालय के पास पहुंचे। उन्होंने बताया कि भगवान विष्णु उनकी पुत्री पार्वती से विवाह करना चाहते हैं। यह सुनकर हिमालय अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने विवाह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
जब माता पार्वती को इस निर्णय की जानकारी मिली तो वे व्यथित हो गईं, क्योंकि वे मन से भगवान शिव को अपना पति स्वीकार कर चुकी थीं। उन्होंने अपनी सखी को अपनी व्यथा बताई। सखी ने उन्हें धैर्य रखने की सलाह दी और भगवान शिव की आराधना जारी रखने के लिए एक निर्जन वन में जाने का सुझाव दिया।
मान्यता के अनुसार माता पार्वती अपनी सखी के साथ घने वन में चली गईं और वहां भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए पुनः तपस्या में लीन हो गईं।
रेत का शिवलिंग बनाकर किया व्रत
कथा के अनुसार भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन माता पार्वती ने नदी के किनारे रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भगवान शिव की आराधना करते हुए व्रत रखा। उन्होंने रात्रि जागरण कर भगवान शिव की स्तुति की।
माता पार्वती की कठोर तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके सामने प्रकट हुए और वर मांगने को कहा। माता पार्वती ने भगवान शिव से उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने उनकी मनोकामना स्वीकार कर ली।
कथा में आगे वर्णन मिलता है कि पर्वतराज हिमालय माता पार्वती को खोजते हुए वहां पहुंचे। माता पार्वती ने पिता को अपनी इच्छा बताई और भगवान शिव से ही विवाह करने का संकल्प दोहराया। इसके बाद हिमालय ने उनकी इच्छा स्वीकार की और कालांतर में भगवान शिव और माता पार्वती का विधि-विधान से विवाह संपन्न हुआ।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी प्रसंग की स्मृति में भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हरतालिका तीज व्रत किया जाता है। श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर सुखी वैवाहिक जीवन और मनोवांछित फल की कामना करते हैं।
मंगलवार को ऋषि पंचमी व्रत
हरतालिका तीज के बाद मंगलवार को ऋषि पंचमी व्रत रखा जाएगा। धार्मिक परंपराओं में यह व्रत सप्तऋषियों के पूजन और आत्मशुद्धि से जुड़ा माना गया है। इस दिन श्रद्धालु विधि-विधान से सप्तऋषियों एवं अरुंधती का पूजन करते हैं।
ऋषि पंचमी कथा: सुमित्र और जयश्री की कथा
प्रचलित धार्मिक कथा के अनुसार सतयुग में विदर्भ नगरी में श्येनजित नामक राजा हुए। उनके राज्य में सुमित्र नामक कृषक अपनी पत्नी जयश्री के साथ रहता था। कथा में धार्मिक शुचिता से जुड़े नियमों के उल्लंघन के कारण दोनों को अगले जन्म में पशु योनि प्राप्त होने का वर्णन मिलता है।
दोनों अपने पुत्र सुचित्र के घर पशु रूप में रहने लगे। एक दिन श्राद्ध के अवसर पर बने भोजन में एक सर्प के कारण विष पड़ने का संकट उत्पन्न हुआ। कथा के अनुसार माता ने कुतिया के रूप में भोजन को छूकर परिवार को अनिष्ट से बचाया, लेकिन वास्तविकता से अनजान परिवार ने उसके व्यवहार को गलत समझ लिया।
बाद में सुचित्र ने अपने माता-पिता की व्यथा जानी और उनके उद्धार का उपाय जानने के लिए ऋषियों के पास गया। ऋषियों ने उसे पत्नी सहित ऋषि पंचमी का व्रत करने और उसका पुण्य माता-पिता को समर्पित करने की सलाह दी।
धार्मिक परंपरा के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पंचमी पर स्नान एवं शुद्धि के बाद अरुंधती सहित सप्तऋषियों का पूजन किया जाता है। व्रत से जुड़ी विधियां अलग-अलग क्षेत्रों और पारिवारिक परंपराओं में भिन्न हो सकती हैं।
कथा के अनुसार सुचित्र और उसकी पत्नी ने विधि-विधान से ऋषि पंचमी व्रत किया और उसका पुण्य माता-पिता को समर्पित किया, जिससे उन्हें पशु योनि से मुक्ति प्राप्त हुई।
ऋषि पंचमी से जुड़ी दूसरी प्रचलित कथा
ऋषि पंचमी की एक अन्य प्रचलित कथा में विदर्भ देश के एक सदाचारी ब्राह्मण, उसकी पत्नी और पुत्री का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार विवाह के बाद पुत्री विधवा हो गई और माता-पिता के साथ गंगा तट पर रहने लगी।
धार्मिक आख्यान में पूर्व जन्म में शुचिता संबंधी नियमों के उल्लंघन को उसके कष्ट का कारण बताया गया। इसके प्रायश्चित के रूप में ऋषि पंचमी व्रत और सप्तऋषियों की आराधना का विधान बताया गया है।
