दैनिक रेवाँचल टाईम्स - भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अजा एकादशी है धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्री कृष्ण अजा एकादशी की महिमा बताते हुए कहते हैं कि यह एकादशी प्राणी के सभी पापों का नाश करने वाली है
अजा एकादशी का व्रत हर साल भादो महीने में एकादशी तिथि को मनाया जाता है इस साल यह एकादशी 7 सितंबर 2026 को पढ़ रही है आध्यात्मिक दृष्टि से यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का सशक्त माध्यम है मान्यता है कि यह व्रत मन को निर्मल बनाकर बुद्धि को स्थिर रखता है
अजा एकादशी की महिमा
धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्री कृष्ण अजा एकादशी की महिमा बताते हुए कहते हैं कि यह एकादशी प्राणी के सभी पापों का नाश करने वाली है जो व्यक्ति भगवान ऋषिकेश का पूजन करके इस व्रत का भक्ति भाव से पालन करता है वह इस लोक में सुख भोगकर अंत में विष्णु लोक में जाता है इस व्रत का फल अश्वमेध यज्ञ कठिन तपस्या तीर्थ में दान स्नान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होता है
श्री हरि को प्रसन्न करने की विधि
श्री गणेश सूर्य अग्नि विष्णु शिव तथा पार्वती सब की पूजा और वंदना करके श्री हरि का स्मरण करते हुए व्रत करें भगवान विष्णु का मां लक्ष्मी के साथ चंदन अक्षत पीले पुष्प ऋतु फल तुलसी मंजरी धूप दीप से पूजन करें इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम भगवत गीता का पाठ व विष्णु मत्रों का जाप करने से श्री नारायण की विशेष कृपा प्राप्त होती है
अजा एकादशी की कथा
पूर्व काल में हरिश्चंद्र नाम के चक्रवर्ती राजा हुए जो समस्त भूमंडल के स्वामी तथा सत्य प्रतिज्ञ थे एक समय प्रभु इच्छा से उन्होंने अपना राज्य एक ऋषि को दान कर दिया परिस्थिति वश अपनी पत्नी और पुत्र को भी बेचना पड़ा स्वयं वह एक चांडाल के दास बन गए हुए मुर्दों का दफन किया करते थे इतने पर भी वे विचलित नहीं हुए जब इसी प्रकार कई वर्ष बीत गए तो उन्हें अपने इस नीच कर्म पर बड़ा दुख हुआ और वह इससे मुक्त होने का उपाय खोजने लगे एक बार गौतम ऋषि उनके पास आए हरिश्चंद्र ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी दुख भरी कथा सुनाई राजा हरिश्चंद्र की बातें सुनकर महर्षि गौतम भी अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने राजा से कहा हे राजन भादों के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अजा है तुम इस एकादशी का विधान पूर्वक व्रत तथा रात्रि में जागरण करो इससे तुम्हारे सभी कष्ट दूर हो जाएंगे महर्षि गौतम इतना कहकर चले गए अजा नाम की एकादशी आने पर राजा हरिश्चंद्र ने महर्षि के कहे अनुसार विधि विधान से व्रत का पालन किया इस व्रत के पूणय से राजा सभी दुखों से पार हो गए आकाश में दुनदुभिया बजने लगी एवं देवलोक से पुष्पों की वर्षा होने लगी उन्होंने अपने सामने ब्रह्मा विष्णु महेश आदि देवताओं को खड़ा पाया एवं अपने मृतक पुत्र को जीवित तथा अपनी पत्नी को राजश्री वस्त्र आभूषणों से परिपूर्ण देखा राजा को पुनः अपने राज्य की प्राप्ति हो गई वास्तव में एक ऋषि ने राजा की परीक्षा लेने के लिए यह सब कौतुक किया था परंतु अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ऋषि द्वारा रची गई सारी माया समाप्त हो गई और अंत में हरिश्चंद्र अपने परिवार सहित विष्णु धाम को चले गए
