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नगर परिषद भुआ बिछिया के अजब कारनामे, कागजों में दुरुस्त व्यवस्था पर उठे सवाल

 





नगर परिषद भुआ बिछिया की अजब कारनामे और गजब कहानी

*कागजों में दुरुस्त व्यवस्था, धरातल पर हकीकत की पड़ताल जरूरी*

*फिटकरी-ब्लीचिंग पाउडर की खपत, मोटर मरम्मत और सफाई वाहनों के रखरखाव को लेकर जांच की मांग*



दैनिक रेवांचल टाईम्स - मंडला, जिले की नगर परिषद भुआ-बिछिया इन दिनों अपनी कार्य प्रणाली को लेकर जम के चर्चित है जहाँ इस परिषद में अनेकों आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा और अधिकारी से लेकर कर्मचारियों की मनमानी चरम में पहुँच चुकी है और जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी और जिला प्रशासन अखिर कार क्यों अनदेखी कर रही है जहाँ भ्रस्टो का बोलबाला और सरकारी धन की लूट से लेकर ग़बन सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार और फिर सब फ़ाइल में कैद और जाँच के नाम केवल और केवल खानापूर्ति और सब फिर शुरू

      वही परिषद के कुछ जानकर बताते है कि अगर नगर परिषद की सूक्ष्मता से जाँच होती है तो भ्रष्टाचार ग़बन सरकारी में कई गई अनिम्मिता कि परत दर परत खुल सकती हैं और अगर सही जाँच हुई तो बाबू से लेकर साहब तक हवालात के पीछे नजर आ सकते हैं। वही जानकर बताते है कि नगर परिषद को प्रदाय वाहन शाखा और वाटर फिल्टर प्लांट की कार्यप्रणाली को लेकर इन दिनों चर्चाओं का बाजार गर्म है। प्राप्त सूत्रों के हवाले से सामने आ रही जानकारियों ने नगर की जलापूर्ति, वाहन रखरखाव और शासकीय संसाधनों के उपयोग की व्यवस्था पर कई प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। नागरिकों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि अभिलेखों में दर्ज आंकड़ों और धरातल पर दिखाई देने वाली वास्तविक स्थिति के बीच कहीं कोई अंतर तो नहीं है।

      वही सूत्रों के अनुसार वाटर फिल्टर प्लांट में जल शुद्धिकरण के लिए उपयोग की जाने वाली फिटकरी एवं ब्लीचिंग पाउडर की आवक तथा खपत का पूरा लेखा-जोखा संबंधित रजिस्टरों में दर्ज किया जाता है। किंतु इन अभिलेखों में अंकित मात्रा की वास्तविकता कितनी है, सामग्री का उपयोग निर्धारित मानकों के अनुरूप हो रहा है या नहीं तथा भंडारण एवं खपत का मौके पर कितना मिलान होता है, यह अपने आप में जांच का विषय है। यदि जिला प्रशासन अथवा सक्षम तकनीकी अधिकारियों द्वारा भौतिक सत्यापन कराया जाए तो कागजी आंकड़ों और वास्तविक उपयोग की स्थिति सामने आ सकती है।

मोटरों की मरम्मत को लेकर भी उठ रहे सवाल

नगर की जलापूर्ति व्यवस्था में उपयोग होने वाली बड़ी मोटरों को लेकर भी सूत्रों से कई तरह की जानकारियां सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि कुछ मोटरों को खराब दर्शाकर मिस्त्री के पास भेजा जाता है और मरम्मत के बाद संबंधित बिल प्रस्तुत कर मोटरों को पुनः नगर परिषद की शाखा में भेज दिया जाता है। ऐसे में यह जांच आवश्यक हो जाती है कि संबंधित मोटर वास्तव में खराब थी अथवा नहीं, उसमें कौन-सा तकनीकी दोष था, मरम्मत के नाम पर कौन-कौन से कार्य किए गए और उसके एवज में कितना भुगतान किया गया।

यदि नगर परिषद के अभिलेखों में दर्ज मरम्मत कार्यों का मिलान मोटरों की वास्तविक तकनीकी स्थिति, मरम्मत बिल और भुगतान अभिलेखों से कराया जाए तो स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है। नगरवासियों का कहना है कि सार्वजनिक धन से होने वाले प्रत्येक खर्च में पारदर्शिता सर्वोपरि होनी चाहिए, क्योंकि यह राशि अंततः जनता के हित में ही खर्च की जाती है।

सफाई वाहनों की हालत भी सवालों के घेरे में

नगर परिषद के अंतर्गत संपूर्ण नगर क्षेत्र की सफाई व्यवस्था में लगे वाहनों की स्थिति भी चर्चा का विषय बनी हुई है। नगर के विभिन्न हिस्सों में कचरा संग्रहण एवं सफाई कार्य में प्रयुक्त वाहनों की वास्तविक दशा किसी से छिपी नहीं है। कहीं वाहन पुराने और जर्जर दिखाई देते हैं तो कहीं उनके नियमित रखरखाव को लेकर सवाल उठते हैं।

सूत्रों की मानें तो वाहनों की स्थिति कागजी रिकॉर्ड में अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देती है। ऐसे में प्रत्येक वाहन का भौतिक निरीक्षण कर उसके रखरखाव, मरम्मत, डीजल-पेट्रोल व्यय, स्पेयर पार्ट्स की खरीदी और मरम्मत पर हुए भुगतान का स्वतंत्र रूप से परीक्षण कराया जाना आवश्यक है। यदि अभिलेखों में वाहन दुरुस्त दर्शाए गए हैं तो फिर वास्तविक परिस्थितियों में उनकी कार्यक्षमता का परीक्षण भी किया जाना चाहिए।

रिकॉर्ड और धरातल के बीच हो सत्यापन

वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार नगर परिषद जैसी स्थानीय स्वशासी संस्था में अभिलेख केवल कागजों का पुलिंदा नहीं होते, बल्कि वे सार्वजनिक धन के उपयोग और प्रशासनिक पारदर्शिता का आईना होते हैं। इसलिए वाटर फिल्टर प्लांट में फिटकरी एवं ब्लीचिंग पाउडर की आवक-खपत, मोटरों की मरम्मत, वाहन शाखा के खर्च तथा सफाई वाहनों के रखरखाव से संबंधित समस्त दस्तावेजों का परीक्षण कराया जाना जरूरी है।

नगरवासियों का कहना है कि यदि व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी है तो जांच से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। निष्पक्ष जांच से जहां बेवजह उठ रही शंकाओं पर विराम लग सकता है, वहीं यदि कहीं अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदारों की जवाबदेही भी सुनिश्चित की जा सकेगी।

अब देखना यह है कि इन चर्चाओं और शिकायतों के बीच जिला प्रशासन इस पूरे मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या वाटर फिल्टर प्लांट एवं वाहन शाखा के रिकॉर्ड का भौतिक सत्यापन कराता है। फिलहाल नगरवासियों की नजर प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी है और उम्मीद की जा रही है कि जांच के माध्यम से कागजों में दर्ज व्यवस्था और धरातल की वास्तविक तस्वीर के बीच का अंतर स्पष्ट हो सकेगा।

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