सरकार के गोदाम में अनाज का नष्ट होना और गरीब परिवारों के घर में भोजन की कमी,इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता
दैनिक रेवाँचल टाईम्स - मंडला जिले के सरकारी गोदाम में रखा हजारों क्विंटल गेहूं कीड़ों के प्रकोप और लापरवाही के कारण खराब होने का समाचार अत्यंत चिंताजनक है। समाचार के अनुसार रबी विपणन वर्ष 2025-26 में नागरिक आपूर्ति निगम के माध्यम से खरीदा गया लगभग 17 हजार 859 क्विंटल गेहूं, यानी करीब 1,786 टन अनाज, गोदाम में भंडारित था। इसमें बड़ी मात्रा में गेहूं में कीड़े लग गए हैं और कई बोरियां खराब होकर अनाज के उपयोग योग्य नहीं रहने की स्थिति में पहुंच गई हैं। यह घटना ऐसे जिले में हुई है जहां बड़ी आबादी, विशेषकर आदिवासी और दूरस्थ ग्रामीण समुदाय, आज भी गरीबी, खाद्य असुरक्षा और कुपोषण जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं। इसलिए सरकारी गोदाम में अनाज का सड़ना केवल भंडारण व्यवस्था की तकनीकी विफलता नहीं है, बल्कि इसे भूख और कुपोषण के बीच सरकारी खाद्य व्यवस्था की गंभीर विडंबना के रूप में देखा जाना चाहिए। अधिकारियों ने गोदाम की स्थिति की निगरानी और रखरखाव में कथित लापरवाही बरती है। यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि समय पर निरीक्षण, कीट नियंत्रण, उचित वेंटिलेशन, स्टैक प्रबंधन अथवा भंडारित गेहूं की नियमित गुणवत्ता जांच नहीं की गई, तो संबंधित अधिकारियों और गोदाम प्रभारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। केवल अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगना पर्याप्त नहीं होगा।बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के संयोजक राज कुमार सिन्हा ने मांग किया है कि मंडला के सरकारी गोदाम में खराब हुए 17,859 क्विंटल गेहूं की स्वतंत्र एवं समयबद्ध जांच कराई जाए। गेहूं के नुकसान का वास्तविक मात्रा एवं आर्थिक मूल्य सार्वजनिक किया जाए। दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और गोदाम प्रभारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए तथा सरकारी नुकसान की भरपाई की जाए। जिले के सभी सरकारी खाद्यान्न गोदामों का विशेष निरीक्षण कराकर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। खराब अनाज को गरीबों में वितरित करने के बजाय वैज्ञानिक परीक्षण के बाद ही उसके निस्तारण का निर्णय लिया जाए, ताकि लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न हो। मंडला जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विशेष खाद्य एवं पोषण सुरक्षा अभियान चलाया जाए। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों में कुपोषण एवं एनीमिया की ग्रामवार स्थिति सार्वजनिक की जाए। सभी आंगनवाड़ियों में बच्चों के वजन, ऊंचाई और पोषण स्थिति की नियमित जांच सुनिश्चित की जाए तथा गंभीर कुपोषित बच्चों के लिए तत्काल उपचार एवं पोषण पुनर्वास की व्यवस्था की जाए। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में किसी भी पात्र आदिवासी या गरीब परिवार को राशन से वंचित न रहने देने के लिए ग्रामसभा की निगरानी व्यवस्था लागू की जाए। सरकारी खाद्यान्न के भंडारण और वितरण व्यवस्था में सामाजिक अंकेक्षण तथा ग्रामसभा की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। ज्ञात हो कि नीति आयोग के राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक 2023, जो नेशनल फेमली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस -5) 2019-21 के आंकड़ों पर आधारित है, के अनुसार मंडला जिले में 9.88 प्रतिशत आबादी बहुआयामी गरीबी में थी। एनएफएचएस-4 की रिपोर्ट 2015-16 में यह अनुपात 31.87 प्रतिशत था। गरीबी में कमी निश्चित रूप से सकारात्मक है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि जिले में गरीबी और खाद्य असुरक्षा समाप्त हो गई है। बहुआयामी गरीबी का सूचकांक स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और जीवन-स्तर जैसी अनेक वंचनाओं को एक साथ मापता है। सिन्हा ने कहा कि विशेष चिंता की बात यह है कि मंडला जैसे आदिवासी बहुल जिले में आर्थिक गरीबी के साथ-साथ पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार, कृषि संसाधनों और गुणवत्तापूर्ण खाद्य तक पहुंच की समस्याएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
राज कुमार सिन्हा
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ
