_सर्प के जहरीले होने पर भी रक्षक होने का दिया जाता है संदेश : पी.डी.खैरवार - समाजसेवी_
*दैनिक रेवाँचल टाईम्स - मण्डला।* नागपंचमी का पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति में हर जीव का अपना महत्व है। साँप भले ही ज़हरीला हो, पर वह किसान का मित्र होता है। मण्डला जैसा जंगल और कृषि प्रधान जिला इस "सह-अस्तित्व" के भाव को सबसे अच्छे से समझता है।
समाजसेवी पी.डी.खैरवार ने बताया कि वैसे तो यह पर्व जगह-जगह अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है, पर बसनिया बांध डूब प्रभावित आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के बड़झर गांव में हर साल की तरह नागपंचमी सार्वजनिक रूप से मनाई गई। यहां के रहने वाले समाजसेवी हेमराज मसराम के अनुसार यहां हर वर्ष की तरह इस बार भी "पटा बैठक" का आयोजन हुआ। दोपहर से देर शाम तक नागिन गीतों की धूम और ढोल-मंजीरों की गूंज के बीच बरुओं का नागिन नाच चलता रहा। आसपास के गांवों से भी लोग एकत्र हुए। पटेल मुक्कदम सरकार सुमरिन लाल परते जी के घर प्रकृति की अर्जी "जौहार सुमरनी" के साथ पटा की शुरुआत हुई। होम-घी ,राल,लोभान की आहुति और गुरु व ग्रामवासियों द्वारा गीतों की मधुर श्रृंखला के बीच सुम्मत लाल परते को शक्ति के रूप में नाग देव विराजमान हुए, जिसे बरुआ भी कहते हैं। गांव की सुख-समृद्धि के लिए यह आयोजन किया गया। ग्रामीणों ने बताया कि पुरखों की आस्था को आज भी बड़झर के लोग मिलजुल कर निभाते हैं और अपनी संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।
*पटा बैठक की विशेष परंपराएं पूजा*: लोग माहुल पत्तों के दोने में कच्चा दूध रखकर बमीठों और खेतों की मेड़ों पर चढ़ाते हैं। नारियल, धूप-दीप से नागदेव की पूजा की जाती है। गांव में एक स्थान पर पटे पर दीप जलाकर नागदेव की स्थापना होती है। चिन्हित व्यक्ति को नागदेव की सवारी आती है। वह नागिन गीत पर सर्प की तरह लहराता है और कांसे की थाली में रखा दूध पीकर दूसरी थाली में रक्त जैसे रंग का "जहर" निकालता है। मान्यता है ,कि इससे क्षेत्र में साल भर सर्पदंश का असर नहीं होता। नागदेव को कष्ट से बचाने इस दिन घरों में तवे की रोटी नहीं बनाई जाती।
*"मारो नहीं, बचाओ"*: असली साँप को पकड़कर पूजा नहीं की जाती। घर की देहरी पर गोबर से नाग-नागिन बनाकर "दूर से सम्मान" का संदेश दिया जाता है।
*ज़हरीला है, फिर भी पूजनीय क्यों?* मण्डला के खेतों में चूहे फसल को नष्ट करते देते हैं। साँप उन्हें खाकर फसल बचाता है। इसलिए किसान उसे "खेत का रखवाला" भी मानते हैं।
- *पारिस्थितिकी का संतुलन*: कान्हा-मण्डला के जंगलों में साँप खाद्य श्रृंखला की कड़ी हैं। इनके बिना चूहे-कीट बढ़ जाएंगे और जंगल का संतुलन बिगड़ जाएगा। गोंड-बैगा आदिवासी नाग को "धरती माता का गहना" मानते हैं। धार्मिक मान्यता भी है , कि नाग के सिर पर धरती टिकी है।
वन विभाग और स्वयंसेवी संगठन अब सर्प रेस्क्यू की ट्रेनिंग भी देते हैं। सीखकर सर्प मित्र साँपों को पकड़कर जंगल में सुरक्षित छोड़ते हैं।
आज जंगल कटने से साँप बस्तियों में आ रहे हैं। नागपंचमी हमें भयमुक्त करती है और ज़हरीले-निर्विष साँप में फर्क करना सिखाती है। `साँप को मारो मत, प्रकृति का संतुलन बिगड़ेगा। नाग देवता को पूजो, खेत और जंगल बचेगा।` "जीओ और जीने दो" का सिद्धांत पर्यावरण रक्षा का आधार है। साथ ही मण्डला के बैगा वैद्यों का पारंपरिक ज्ञान भी इस पर्व से जुड़ा है।
नागपंचमी बताती है, कि ताकतवर होने का मतलब मारना नहीं, रक्षा करना है। मण्डला में लोग साँप से डरने के बजाय सम्मान करते हैं क्योंकि "जो ज़हरीला है वही सबसे बड़ा रक्षक भी है"।

