जर्जर भवन में जान जोखिम में डाल पढ़ रहे झूलनटोला के बच्चे
तीन साल से आवेदन,
जनसुनवाई और आश्वासन के बाद भी नहीं बना स्कूल भवन
खुले आंगन में पढ़ने को मजबूर पालकों ने दी आंदोलन की चेतावनी
रेवांचल टाइम्स मवई मण्डला शासन-प्रशासन की ओर से शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने, प्रत्येक बच्चे को सुरक्षित वातावरण में शिक्षा उपलब्ध कराने और गांव-गांव तक स्कूल की सुविधाएं पहुंचाने के दावे लगातार किए जाते हैं। लेकिन आदिवासी बाहुल्य मण्डला जिले के विकासखंड मवई अंतर्गत ग्राम पंचायत देवरीदादर के आश्रित ग्राम झूलनटोला की तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े करती है। यहां प्राथमिक शाला का भवन वर्षों से जर्जर पड़ा है। स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि भवन को डिस्मेंटल करने का आदेश तो कर दिया गया, लेकिन उसके बाद नया भवन बनवाने की प्रक्रिया मानो सरकारी फाइलों में ही दफन होकर रह गई।
नतीजा यह है कि झूलनटोला के करीब पांच दर्जन मासूम बच्चे सुरक्षित स्कूल भवन के बजाय कभी खुले असुरक्षित आंगन में तो कभी ग्रामीणों के निजी घरों में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। बरसात, गर्मी और अन्य मौसम की परेशानियों के बीच बच्चों की पढ़ाई किस तरह संचालित हो रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस भवन में बच्चों को बैठकर भविष्य गढ़ना था, वही भवन आज उनकी सुरक्षा के लिए खतरा बन चुका है।
छत और दीवारें दे चुकी हैं खतरे की दस्तक
ग्रामीणों के अनुसार झूलनटोला प्राथमिक शाला का भवन काफी समय से जर्जर अवस्था में है। भवन की छत और दीवारें क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों को भवन के अंदर बैठाना किसी बड़े हादसे को न्योता देने से कम नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि जब भवन सुरक्षित नहीं रहा तो उसे डिस्मेंटल करने का आदेश किया गया, लेकिन नया भवन बनाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब विभाग को पहले से पता था कि पुराना भवन बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं है, तो वैकल्पिक व्यवस्था और नए भवन की स्वीकृति समय रहते क्यों नहीं की गई क्या किसी हादसे के बाद ही प्रशासन की नींद खुलेगी
तीन साल से कागजों में दौड़ रही मांग
झूलनटोला के ग्रामीणों का कहना है कि स्कूल भवन की समस्या आज की नहीं है। करीब तीन वर्षों से ग्रामीण लगातार आवेदन, निवेदन और शिकायतों के माध्यम से अधिकारियों का ध्यान इस ओर आकर्षित करा रहे हैं। अक्टूबर 2024 में ग्राम पंचायत के सरपंच द्वारा भी खंड शिक्षा अधिकारी मवई को पत्र भेजकर स्कूल भवन की स्थिति से अवगत कराया गया था।
इसके बाद भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। ग्रामीणों ने बताया कि मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान के शिविर में भी कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा गया था। स्थानीय स्तर पर ब्लॉक और जनपद अधिकारियों के समक्ष भी समस्या रखी गई, लेकिन हर बार आश्वासन के बाद मामला आगे नहीं बढ़ सका।
ग्राम सभा में प्रस्ताव, फिर भी नहीं जागा विभाग
ग्रामीणों के अनुसार अगस्त 2026 में ग्राम सभा की बैठक में स्कूल भवन के निर्माण को लेकर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया। ग्राम सभा जैसी लोकतांत्रिक संस्था द्वारा प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद भी यदि बच्चों के लिए सुरक्षित भवन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, तो यह व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
ग्रामीणों का कहना है कि स्कूल भवन का मामला केवल ईंट-पत्थर की इमारत का मामला नहीं है। यह सीधे बच्चों की सुरक्षा और उनके भविष्य से जुड़ा हुआ है। जब गांव के लोग बार-बार अधिकारियों के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं, तब विभागीय स्तर पर फाइलों को गति क्यों नहीं दी जा रही, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।
कलेक्टर से भी लगाई गुहार
समस्या को लेकर ग्रामीणों ने जिला प्रशासन के समक्ष भी अपनी बात रखी। ग्रामीणों के अनुसार वे कलेक्टर के चेंबर तक पहुंचकर स्कूल भवन की जर्जर स्थिति की जानकारी दे चुके हैं। इस दौरान उन्हें जून 2026 तक भवन बनवाए जाने का आश्वासन मिलने की बात कही गई थी।
लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि जून 2026 की समयसीमा भी गुजर गई और नया भवन धरातल पर दिखाई नहीं दिया। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर आश्वासन की समयसीमा खत्म होने के बाद भी जिम्मेदारी तय क्यों नहीं हुई?
ग्रामीणों के सामने स्थिति यह है कि बच्चे स्कूल जाना चाहते हैं, पालक चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़ें, शिक्षक पढ़ाने के लिए तैयार हैं, लेकिन सुरक्षित भवन नहीं है। ऐसे में सरकारी योजनाओं और शिक्षा के अधिकार के दावों की वास्तविक परीक्षा झूलनटोला जैसे गांवों में ही होती है।
खुले आंगन में पढ़ाई, कब तक
ग्रामीणों ने बताया कि जर्जर भवन के कारण बच्चों की पढ़ाई कई बार खुले और असुरक्षित स्थानों पर संचालित करनी पड़ती है। करीब पांच दर्जन बच्चों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। बारिश के दौरान खुले स्थान पर पढ़ाई संभव नहीं होती और गर्मी में भी बच्चों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
मासूम बच्चे किसी निर्माण एजेंसी की गलती, विभागीय देरी या सरकारी प्रक्रिया के जिम्मेदार नहीं हैं। उन्हें केवल सुरक्षित वातावरण में पढ़ने का अधिकार चाहिए। लेकिन झूलनटोला में बच्चों की पढ़ाई व्यवस्था मानो सरकारी लापरवाही और कागजी कार्रवाई के बीच फंसकर रह गई है।
पालकों में बढ़ रहा आक्रोश
स्कूल भवन की समस्या को लेकर अब पालकों में भी आक्रोश बढ़ता जा रहा है। पालकों का कहना है कि यदि किसी दिन जर्जर दीवार या छत बच्चों के ऊपर गिर गई तो उस हादसे की जिम्मेदारी कौन लेगा क्या किसी बच्चे के घायल होने या जान जाने के बाद ही प्रशासन कार्रवाई करेगा
ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि जब पुराने भवन को असुरक्षित मानकर डिस्मेंटल करने की प्रक्रिया की गई, तो नया भवन स्वीकृत कराने में इतनी लंबी देरी क्यों हुई यदि बजट, स्वीकृति या तकनीकी प्रक्रिया में कोई अड़चन है तो विभाग उसे दूर करने के लिए क्या कदम उठा रहा है
केवल झूलनटोला नहीं, पूरे जिले में सवाल
पालक महासंघ का कहना है कि झूलनटोला की समस्या अकेली नहीं है। जिले के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल भवनों की स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है। कहीं भवन जर्जर हैं, कहीं पेयजल की समस्या है, कहीं शौचालय और अन्य मूलभूत सुविधाओं का अभाव है तो कहीं शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
सरकारी आंकड़ों में नामांकन और शिक्षा व्यवस्था की उपलब्धियां दिखाई जा सकती हैं, लेकिन गांव की वास्तविक तस्वीर तब सामने आती है जब बच्चों को स्कूल भवन के बजाय किसी ग्रामीण के आंगन में बैठकर पढ़ना पड़े।
मण्डला जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले में शिक्षा की स्थिति और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों के लिए स्कूल ही आगे बढ़ने का सबसे बड़ा माध्यम है। यदि स्कूल भवन ही सुरक्षित नहीं होगा तो बच्चों और उनके पालकों का सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर विश्वास कैसे कायम रहेगा
एक महीने में सर्वे और भवन स्वीकृति की मांग
झूलनटोला से बड़ी संख्या में महिला-पुरुष ग्रामीण जनसुनवाई में पहुंचे और कलेक्टर तथा जिला परियोजना समन्वयक (डीपीसी) के समक्ष अपनी मांग रखी। ग्रामीणों ने मांग की है कि झूलनटोला प्राथमिक शाला सहित जिले के सभी जर्जर स्कूल भवनों का व्यापक सर्वे कराया जाए और ऐसे विद्यालयों के लिए तत्काल नए भवन स्वीकृत किए जाएं।
ग्रामीणों ने प्रशासन को एक महीने के भीतर ठोस कार्रवाई करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समस्या का समाधान नहीं हुआ तो वे आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।
पालक महासंघ ने भी चेताया
पालक महासंघ मण्डला के जिला अध्यक्ष पी.डी. खैरवार ने कहा कि विकासखंड मवई के देवरीदादर झूलनटोला में करीब पांच दर्जन बच्चों की पढ़ाई पिछले तीन वर्षों से असुरक्षित परिस्थितियों में संचालित होना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि जिले के सैकड़ों स्कूलों की समस्याओं को आवेदन, निवेदन, सोशल मीडिया और मीडिया के माध्यम से शासन-प्रशासन के सामने कई बार लाया जा चुका है, लेकिन अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा है।
खैरवार के अनुसार विशेष रूप से आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों के बच्चों का भविष्य ऐसी व्यवस्थागत लापरवाही से प्रभावित हो रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन ने समय रहते जर्जर स्कूल भवनों की स्थिति सुधारने और नए भवन स्वीकृत करने की कार्रवाई नहीं की तो पालकों को अच्छी और सुरक्षित शिक्षा की मांग को लेकर सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
हादसे का इंतजार या पहले होगी कार्रवाई
झूलनटोला का मामला अब सिर्फ एक स्कूल भवन का मामला नहीं रह गया है। यह उस सरकारी व्यवस्था की परीक्षा है, जो बच्चों को सुरक्षित वातावरण में शिक्षा देने का दावा करती है। जब विभाग को भवन की जर्जर स्थिति की जानकारी है, ग्राम पंचायत ने पत्र लिख दिया, ग्राम सभा ने प्रस्ताव पारित कर दिया, ग्रामीणों ने अधिकारियों से गुहार लगा दी और जिला प्रशासन के समक्ष भी मामला पहुंच चुका है, तो फिर नया भवन अब तक क्यों नहीं बना
सबसे अहम सवाल यही है कि क्या प्रशासन किसी संभावित हादसे का इंतजार कर रहा है?
बच्चों की जिंदगी किसी सरकारी फाइल से बड़ी है। यदि जर्जर भवन को पहले ही असुरक्षित माना जा चुका है तो नए भवन की स्वीकृति और निर्माण में देरी का कोई औचित्य नहीं होना चाहिए। झूलनटोला के बच्चे और उनके पालक अब आश्वासन नहीं, बल्कि सुरक्षित स्कूल भवन चाहते हैं।
प्रशासन के सामने अब गेंद पूरी तरह उसके पाले में है। देखना होगा कि वर्षों से आवेदन और आश्वासन के बीच उलझी झूलनटोला की यह कहानी अब धरातल पर खत्म होती है या फिर बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा एक बार फिर सरकारी फाइलों में ही कैद होकर रह जाती है।
.jpeg)
