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डालाखापा पंचायत में सोलर लाइट खरीदी पर सवाल: खबरें छपीं, पंचायत दर्पण में बिल भी साफ—फिर कार्रवाई के नाम पर ‘ठेंगा’ क्यों?



₹8-10 हजार के उपकरणों पर ₹20-25 हजार के बिल का आरोप, सरपंच-सचिव से लेकर जनपद और जिला स्तर के जिम्मेदारों की भूमिका पर उठे सवाल




दैनिक रेवाँचल टाइम्स  मंडला।मंडला जिले की ग्राम पंचायतों में विकास योजनाओं के नाम पर सरकारी राशि के कथित दुरुपयोग की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। 

    वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जनपद पंचायत नारायणगंज की ग्राम पंचायत डालाखापा में सोलर रूफ पैनल और सोलर लाइट खरीदी को लेकर उठे सवाल अब केवल ग्रामीणों के आरोप तक सीमित नहीं रह गए हैं। इस मामले को लेकर पूर्व में समाचार प्रकाशित हो चुके हैं और पंचायत दर्पण पर दर्ज बिल एवं भुगतान संबंधी जानकारी भी सार्वजनिक रूप से दिखाई दे रही है। इसके बावजूद यदि कार्रवाई के नाम पर केवल जांच, पत्राचार और आश्वासन ही मिलता रहे तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जिम्मेदारों को किसका इंतजार है?



बिल सामने हैं तो कार्रवाई कब होगी?


वही जानकारी के अनुसार 15वें वित्त आयोग की राशि से पंचायत में सोलर रूफ पैनल और सोलर लाइट खरीदी गई। आरोप है कि जिन उपकरणों की बाजार कीमत लगभग ₹8 से ₹10 हजार बताई जा रही है, उनके लिए पंचायत रिकॉर्ड में ₹20 से ₹25 हजार तक के बिल लगाए गए।


यह आरोप बेहद गंभीर है।


लेकिन उससे भी गंभीर सवाल यह है कि जब पंचायत दर्पण जैसे सार्वजनिक पोर्टल पर पंचायत के कार्यों और भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, तो फिर जिम्मेदार विभागों द्वारा जमीन पर जाकर वास्तविक खरीद, सामग्री की गुणवत्ता, बाजार दर और भुगतान राशि का मिलान क्यों नहीं किया जा रहा?


आखिर कब तक ग्रामीणों को यह बताया जाता रहेगा कि मामले की जांच चल रही है?


पहले खबर, फिर शिकायत, फिर जांच—लेकिन नतीजा कहां?

वही इस मामले की खबर पहले भी प्रकाशित हो चुकी है। ग्रामीणों ने शिकायतें भी कीं। सामान्य सभा में मुद्दा भी उठ चुका है। जनपद पंचायत स्तर से जांच प्रतिवेदन भी मांगे जाने की जानकारी सामने आई है।

फिर सवाल यह है—

इतने सारे संकेतों के बाद भी कार्रवाई कहां है? क्या जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ फाइलों में पत्राचार करके अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेंगे?

क्या जांच का मतलब केवल पंचायत से जवाब मांगना और उसी जवाब को रिकॉर्ड में रख देना है? या फिर वास्तव में यह देखा जाएगा कि जिस सामान के लिए सरकारी राशि खर्च हुई, वह सामान कितने में खरीदा गया, किससे खरीदा गया और उसकी वास्तविक गुणवत्ता क्या है?


सरपंच-सचिव रोजगार सहायक और उपयंत्री ही नहीं, निगरानी करने वालों की भी तय हो जिम्मेदारी


यदि जांच में वित्तीय अनियमितता सामने आती है तो सबसे पहले ग्राम पंचायत के जिम्मेदारों की भूमिका की जांच होना स्वाभाविक है। लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होना चाहिए।

पंचायत से लेकर जनपद पंचायत और जिला पंचायत स्तर तक जिन अधिकारियों की निगरानी और अनुमोदन प्रक्रिया में भूमिका रही, उनकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

क्योंकि सरकारी धन की निगरानी केवल सरपंच और सचिव की जिम्मेदारी नहीं है। यदि पंचायत में कथित रूप से महंगे बिल लगाए गए, भुगतान हुआ और उसके बाद भी संबंधित अधिकारियों को इसकी भनक नहीं लगी, तो सवाल यह भी है कि निगरानी तंत्र कर क्या रहा था?


जनता के पैसे से ‘अपनों’ का घर भरने का आरोप कितना सच?


ग्रामीणों के बीच यह आरोप भी चर्चा में है कि पंचायतों में आने वाली योजनाओं का वास्तविक लाभ जरूरतमंद ग्रामीणों तक पहुंचने के बजाय कथित रूप से जिम्मेदारों और उनके चहेतों के हित में चला जाता है। यदि ऐसा है तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि उस गरीब ग्रामीण के अधिकार पर डाका है जिसके नाम पर सरकार गांव में विकास के लिए पैसा भेजती है। जिस ग्रामीण को एक सोलर लाइट की सुविधा नहीं मिलती, उसके नाम पर सरकारी रिकॉर्ड में हजारों रुपये खर्च दिखा दिए जाएं तो इससे बड़ा मजाक और क्या होगा?


‘जांच’ के नाम पर कब तक बचते रहेंगे जिम्मेदार?


जिले का यह पहला मामला नहीं है जहां शिकायत के बाद जांच की बात कही जाती है। अक्सर पंचायतों में शिकायत होती है, अधिकारी जांच के आदेश देते हैं, पंचायत से प्रतिवेदन मांगा जाता है और फिर मामला कागजों के ढेर में दब जाता है।


लेकिन जनता को जांच नहीं, परिणाम चाहिए।


यदि सब कुछ नियमानुसार हुआ है तो जिम्मेदार विभाग सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे कि—सोलर उपकरण किस दर पर खरीदे गए?

किस फर्म या एजेंसी से खरीदे गए?

कितने कोटेशन लिए गए? स्वीकृत दर क्या थी? वास्तविक भुगतान कितना हुआ? उपकरणों की वर्तमान स्थिति क्या है?

और यदि भुगतान बाजार दर से असामान्य रूप से अधिक हुआ तो उसकी वजह क्या है?

अब जिम्मेदारी तय हो—वरना सरकारी योजनाएं बनेंगी ‘कमाई का जरिया’

सरकार गरीब और ग्रामीण जनता के लिए योजनाएं बनाती है। करोड़ों रुपये पंचायतों तक पहुंचाए जाते हैं ताकि गांवों की तस्वीर बदले। लेकिन यदि योजनाओं की राशि में कथित गड़बड़ी होती है और कार्रवाई के नाम पर केवल ‘ठेंगा’ दिखा दिया जाता है तो इससे भ्रष्टाचार करने वालों के हौसले ही बढ़ेंगे

आज सवाल सिर्फ जनपद पंचायत नारायगंज की डालाखापा ग्राम पंचायत का नहीं है।

सवाल यह है कि क्या पंचायतों में जनता के पैसे की निगरानी करने वाला कोई है? अगर बिल सार्वजनिक पोर्टल पर मौजूद हैं, खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं, शिकायतें हो चुकी हैं और फिर भी कार्रवाई नहीं होती तो आखिर किसके संरक्षण में यह व्यवस्था चल रही है?


स्थानीय जनता की मांग

इस मामले में जिला प्रशासन को चाहिए कि केवल पंचायत से जवाब मांगने के बजाय स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए। खरीदी से जुड़े सभी दस्तावेज, कोटेशन, स्वीकृति, बिल, भुगतान वाउचर, स्टॉक रजिस्टर, सप्लाई रिकॉर्ड और मौके पर लगे सोलर उपकरणों का भौतिक सत्यापन कराया जाए।

यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधितों से शासकीय राशि की वसूली के साथ नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए। और यदि आरोप गलत हैं तो प्रशासन दस्तावेजों के साथ यह स्पष्ट करे कि आखिर ₹8-10 हजार के बताए जा रहे उपकरणों के लिए ₹20-25 हजार तक का भुगतान क्यों और किस आधार पर हुआ।

क्योंकि जनता अब सिर्फ यह सुनना नहीं चाहती कि—

“जांच चल रही है…”

जनता जानना चाहती है—


“जांच का नतीजा क्या आया और जिम्मेदार पर कार्रवाई कब हुई?”

वरना सवाल यही रहेगा—पंचायत दर्पण में बिल दिखाई दे रहे हैं, खबरें भी सामने आ चुकी हैं, शिकायतें भी हो चुकी हैं… फिर कार्रवाई के नाम पर जिम्मेदारों की मुट्ठी से जनता को सिर्फ ‘ठेंगा’ ही क्यों दिखाई दे रहा है?

            — दैनिक रेवाँचल टाइम्स

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