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नाग पंचमी पर कालसर्प दोष का निवारण, मगर महंगाई की नागिन से जनता को कौन बचाएगा



 संपादकीय

सावन के पवित्र माह में आने वाली नाग पंचमी सनातन परंपरा का वह पर्व है, जब देशभर में श्रद्धालु नाग देवता की पूजा-अर्चना कर सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। मान्यता है कि नाग पंचमी के अवसर पर नाग देवता की आराधना करने से कालसर्प दोष की शांति और निवारण होता है। लोग श्रद्धा और विश्वास के साथ मंदिरों में पहुंचते हैं, पूजा करते हैं और अपने जीवन से जुड़े संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं।

लेकिन नाग पंचमी के इस पावन अवसर पर एक सवाल ऐसा भी है, जिसका उत्तर आज का आम आदमी तलाश रहा है—

जब कालसर्प दोष का निवारण पूजा-पाठ से हो सकता है, तो उस ‘महंगाई की नागिन’ का निवारण कौन करेगा, जो लगातार गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को डस रही है?

देश की जनता ने लोकतंत्र के मंदिर में बैठे जिन जनप्रतिनिधियों को अपना प्रतिनिधि और सेवक बनाकर भेजा, उनसे उम्मीद थी कि वे जनता के दुख-दर्द को समझेंगे। चुनाव के समय यही जनप्रतिनिधि जनता के दरवाजे तक पहुंचते हैं, हाथ जोड़ते हैं, समस्याएं सुनते हैं और बड़े-बड़े वादे करते हैं।

लेकिन सत्ता की कुर्सी मिलते ही क्या जनता की तकलीफों की आवाज उतनी ही साफ सुनाई देती है?

आज गरीब आदमी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है। मध्यमवर्गीय परिवार अपनी सीमित आमदनी में बच्चों की पढ़ाई, इलाज, बिजली-पानी, मकान, राशन और अन्य जरूरतों का खर्च उठाने में परेशान है। महंगाई की नागिन लगातार फन फैलाए खड़ी है और आम आदमी की कमर पर उसका डंक लगातार गहरा होता जा रहा है।

दूसरी ओर सत्ता और राजनीति के गलियारों में बैठे कुछ जनप्रतिनिधि ऐसी आलीशान सुविधाओं से घिरे हैं, जिनका खर्च अंततः इसी जनता की मेहनत और टैक्स से चलता है।

यह विरोधाभास लोकतंत्र के लिए गंभीर सवाल है।

एक तरफ जनता महंगाई से जूझ रही है, दूसरी तरफ जनप्रतिनिधियों की सुविधाएं लगातार सुरक्षित हैं।

एक तरफ गरीब परिवार महीने का बजट बनाने में परेशान है, दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं।

नाग पंचमी पर लोग कालसर्प दोष से मुक्ति की कामना करते हैं। लेकिन आज देश को एक और बड़े ‘दोष’ से मुक्ति की जरूरत है—राजनीतिक स्वार्थ, भ्रष्टाचार, महंगाई और जनता से बढ़ती दूरी के दोष से।

जनप्रतिनिधि होना केवल चुनाव जीतकर पद हासिल करना नहीं है। यह जनता के प्रति जिम्मेदारी है। जनता ने अपना वोट देकर किसी को इसलिए नहीं चुना कि वह पांच साल तक सत्ता की सुविधाओं का आनंद ले, बल्कि इसलिए चुना कि उसकी आवाज विधानसभा और संसद तक पहुंचे।

जनता यह भी पूछना चाहती है कि क्या कभी उन आलीशान सरकारी सुविधाओं में रहने वाले माननीयों ने उस गरीब परिवार का बजट बनाया है, जिसे महीने के अंत में राशन और दवा के बीच चुनाव करना पड़ता है?

क्या कभी उन्होंने उस मध्यमवर्गीय पिता की चिंता महसूस की है, जो अपने बच्चों की पढ़ाई और परिवार के बढ़ते खर्च के बीच अपनी इच्छाओं को कुचल देता है?

क्या कभी उन्होंने उस मजदूर का दर्द समझा है, जिसकी रोज की कमाई ही उसके परिवार की जिंदगी का आधार है?

नाग देवता के प्रति आस्था अपनी जगह है और धार्मिक मान्यताओं का सम्मान भी अपनी जगह। लेकिन लोकतंत्र में जनता की पीड़ा भी किसी पूजा से कम महत्वपूर्ण नहीं होनी चाहिए।

इस नाग पंचमी पर आइए, नाग देवता से यही प्रार्थना करें कि देश की जनता को हर उस विष से मुक्ति मिले जो उसके जीवन को कठिन बना रहा है—महंगाई का विष, बेरोजगारी का विष, भ्रष्टाचार का विष और व्यवस्था की उदासीनता का विष।

और देश के जनप्रतिनिधियों से भी जनता की यही अपेक्षा है कि वे ‘जनप्रतिनिधि स्वरूपी नाग’ बनकर जनता को डसने वाली नीतियों और महंगाई की नागिन के सामने मौन दर्शक न बने रहें, बल्कि जनता के लिए ढाल बनकर खड़े हों।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति कोई कुर्सी, कोई पद या कोई सरकारी सुविधा नहीं—

सबसे बड़ी शक्ति जनता का वोट है।

आज नाग पंचमी है।

कालसर्प दोष के निवारण की पूजा होगी, नाग देवता को दूध अर्पित होगा।

लेकिन असली सवाल यही रहेगा—

महंगाई की नागिन से डस रही जनता के लिए निवारण का उपाय कब होगा?

— संपादकीय

दैनिक रेवांचल टाइम्स

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