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नगर परिषद भुआ-बिछिया में कर्मचारियों की भरमार या जरूरत से ज्यादा मेहरबानी? स्वीकृत पदों से अधिक पदस्थापना पर उठे सवाल

 



दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला। जिले की नगर परिषदों की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठना कोई नई बात नहीं है, लेकिन नगर परिषद भुआ-बिछिया में अब कर्मचारियों की संख्या, उनकी पदस्थापना और शाखावार तैनाती को लेकर नई बहस छिड़ गई है। सवाल यह है कि परिषद को जितने कर्मचारियों की वास्तव में आवश्यकता है, क्या उतने ही कर्मचारी पदस्थ हैं या फिर कहीं आवश्यकता से अधिक मानव संसाधन पर सरकारी खजाने का बोझ बढ़ाया जा रहा है?

परिषद के गठन से लेकर अब तक अलग-अलग शाखाओं में कर्मचारियों की पदस्थापना होती रही है। ऐसे में यदि निष्पक्ष तरीके से स्वीकृत पदों, कार्यरत कर्मचारियों, नियुक्ति प्रक्रिया और शाखावार कार्यभार का मिलान किया जाए तो नगर परिषद की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।

किसकी जरूरत, किसकी पदस्थापना—सार्वजनिक हो पूरा हिसाब

सूत्रों के अनुसार परिषद में पदस्थापना को लेकर यह चर्चा भी सामने आ रही है कि नगर परिषद क्षेत्र के बाहर से आने वाले कर्मचारियों को पदस्थापना में प्राथमिकता मिलने की बात कही जा रही है। हालांकि इस दावे की पुष्टि संबंधित विभागीय अभिलेखों और सक्षम स्तर की जांच के बाद ही हो सकेगी।

यही कारण है कि अब सवाल उठ रहा है कि यदि पदस्थापनाएं नियम और आवश्यकता के आधार पर हुई हैं तो फिर पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में आपत्ति क्या है?

नगर परिषद को यह स्पष्ट करना चाहिए कि परिषद में कुल कितने पद स्वीकृत हैं, इनमें से कितने पद भरे हुए हैं, कौन कर्मचारी किस शाखा में पदस्थ है और उसकी पदस्थापना किस आदेश के तहत हुई है। वाहन शाखा से जलप्रदाय तक—हर शाखा की हो पड़ताल, नगर परिषद कार्यालय के अलावा वाहन शाखा, जलप्रदाय, वाटर फिल्टर प्लांट, स्वच्छता सहित अन्य शाखाओं में कर्मचारियों की तैनाती है। ऐसे में प्रत्येक शाखा की आवश्यकता और वास्तविक कार्यभार का स्वतंत्र आकलन किया जाना जरूरी है।

यदि किसी शाखा में कर्मचारियों की संख्या आवश्यकता से अधिक है और दूसरी शाखा में कर्मचारियों का अभाव है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। वहीं आवश्यकता से अधिक कर्मचारियों पर होने वाला वेतन एवं अन्य खर्च सीधे परिषद के वित्तीय संसाधनों को प्रभावित कर सकता है।

नियुक्ति से लेकर वेतन तक, सामने आए पूरा ब्यौरा स्थानीय नागरिकों की मांग है कि परिषद के गठन से लेकर वर्तमान समय तक— स्वीकृत पदों की संख्या

शाखावार पदस्थ कर्मचारियों का विवरण नियुक्ति एवं पदस्थापना आदेश

कर्मचारियों की सेवा स्थिति

वेतन एवं अन्य मदों में होने वाला वार्षिक खर्च संविदा, दैनिक वेतनभोगी अथवा अन्य माध्यम से कार्यरत कर्मचारियों का विवरण सार्वजनिक किया जाए। रिकॉर्ड सामने आने के बाद काफी हद तक यह स्पष्ट हो सकेगा कि परिषद में कर्मचारियों की वास्तविक जरूरत कितनी है और वर्तमान व्यवस्था उसके अनुरूप है या नहीं।

सिर्फ कुर्सियां भरने से नहीं चलेगा नगर परिषद का काम

नगर परिषद का उद्देश्य जनता को बेहतर नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराना है, न कि केवल कार्यालयों में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाना। यदि परिषद में पर्याप्त स्टाफ होने के बावजूद नागरिकों को जलप्रदाय, स्वच्छता, सड़क, प्रकाश व्यवस्था और अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए परेशान होना पड़ रहा है, तो निश्चित रूप से व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है।

जनता के पैसे से चलने वाली संस्था में प्रत्येक पद और प्रत्येक कर्मचारी की उपयोगिता स्पष्ट होनी चाहिए। सवाल यह भी है कि यदि किसी शाखा में जरूरत से ज्यादा स्टाफ है तो उसकी जिम्मेदारी तय कौन करेगा और यदि कहीं कर्मचारियों की कमी है तो वहां व्यवस्था सुधारने के लिए कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं?

अब जिला प्रशासन की परीक्षा

नगर परिषद में कर्मचारियों की संख्या और पदस्थापना को लेकर उठ रहे सवालों के बीच अब निगाहें जिला प्रशासन और नगरीय प्रशासन विभाग पर टिकी हैं।

क्या परिषद के गठन से अब तक हुई नियुक्तियों और पदस्थापनाओं की समीक्षा होगी?

क्या स्वीकृत पदों और वास्तविक कार्यरत कर्मचारियों का मिलान कराया जाएगा? क्या शाखावार कार्यभार का वैज्ञानिक आकलन होगा? क्या परिषद के वेतन एवं स्थापना व्यय की समीक्षा की जाएगी? और यदि जांच में नियमों के विपरीत कोई तथ्य सामने आता है तो क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी?

इन सवालों का जवाब अब सिर्फ चर्चाओं से नहीं, बल्कि रिकॉर्ड सार्वजनिक करने और निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए। जनता के पैसे से चलने वाली नगर परिषद में हिसाब भी जनता के सामने होना चाहिए—यही पारदर्शिता और जवाबदेही की पहली शर्त है।

अगर आपके पास कर्मचारियों की सूची, स्वीकृत पदों का

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