* पी.डी. खैरवार
अचानक बढ़े गुड़-शक्कर के भाव ने पकवानों की मिठास किया फीका
दैनिक रेवाँचल टाईम्स - मण्डला। शुक्रवार को मवई विकासखंड के नयेगांव (नवगंवा) में आदिवासी परंपरा का अनोखा पर्व भीमानवा जीवंत हुआ। पूरे गांव के साथ ग्रामीण समाजसेवी और गोंडवाना गीतकार धन सिंह परते के परिवार ने भी पुरखों से चले आ रहे इस पर्व को बड़े ही प्राकृतिक विधि-विधान से मनाया।
वही मण्डला जिले की आदिवासी परंपरा का यह एक ऐसा पर्व है जो किसी कैलेंडर में नहीं, बल्कि गांव के बुजुर्गों की बैठक में सालाना तय होता है।
*क्या है भीमा नवा पर्व*
मण्डला जिले में आदिवासी मान्यताओं के चलते भीमा नवा का पर्व हरियाली अमावस्या पर्व के पहले मनाने की परंपरा है। यदि किसी कारणवश इस पर्व को समय पर नहीं मना पाने की स्थिति में हरियाली अमावस्या और रक्षाबंधन के बीच भी इसे मना लिया जाता है।
इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है इसकी एकता। अपनी सुविधानुसार पूरा गांव एक साथ इसे मनाता है। कुछ दिन पहले गांव के बड़े-बुजुर्ग किसी एक स्थान पर बैठकर तय करते हैं,जिसे टीवा करना भी कहा जाता है। कि पर्व किस दिन मनाया जाएगा,और तय दिन को पूरे गांव में काम-धाम बंद, हड़ताल जैसा माहौल। कोई खेत नहीं जाएगा, कोई काम-धंधा नहीं। पूरा परिवार घर पर रहकर आराम करता है। लोग गांव में घूम-घूमकर एक-दूसरे से मिलते जुलते हैं।
गांव के एक कोने से दूसरे कोने तक दिनभर पकवान की महक बनी रहती है। खासकर उड़द दाल के कुरकुरे बड़े, चावल आटा और गुड़-शक्कर के मिश्रण से बने चीला-उल्टा, गेहूं आटा गुड़-शक्कर मिलाकर बने बबरा, गुलगुले पकाने का रिवाज प्रायः हर घर में जीवंत है।
वही धन सिंह परते ने अचानक बढ़ी मंहगाई को लेकर बताया कि गुड़-शक्कर जैसे बहु उपयोगी खाने की सामग्रितों की बेतहाशा बढ़ी कीमत के कारण ऐसे मिठास भरे पकवान इस पर्व में कम घरों में बनाए जाने की चर्चा गांव में दिनभर चलती रही। जिससे खुशियों से भरे इस पर्व को फीका अनुभव किया गया। यह पर्व मुख्य रूप से आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों का आत्मा पर्व है।
*क्या है विधान भीमानवा का*
गांव के ऐसे तीज-त्यौहारों में घरों का दृश्य कुछ ऐसा होता है। कुछ लोग इसे भीमा नवा कहते हैं, पर सामान्य बोलचाल में इसे *भीमा* ही कहते हैं। इस दिन गोबर और छुई मिट्टी से घर की जमीन की लिपाई जरूर की जाती है। बड़े-बुजुर्ग पति-पत्नी उपवास रखते हैं। शाम ढलते ही अन्न माता की गोंगो पूजा होती है।
और असली नजारा तो शाम का होता है, जब घर की उपवासी बहू-बेटियां व बुजुर्ग ग्रामीण और देशी परिवेश में स्वच्छ वस्त्र धारण कर कांसा के गड़ुआ (लोटा) में पानी भरकर कांसा की ही थाली में पकवान सजाकर घर के फाटक में तैयार खड़ी रहती हैं। दिनभर जंगल में चरकर लौटते गाय-बैलों और पशुधन का ये बहू-बेटियां सबसे पहले मुंह धुलाकर, हल्दी-चावल का टीका लगाकर स्वागत करती हैं और फिर माताएं उन्हें बड़े प्यार से पकवान खिलाती हैं। यह प्यार पाकर इन मवेशियों का अपनापन भी उमड़ पड़ता है, जो इनकी आंखों में झलकता है।दरअसल लोग अपने घर के सदस्यों की तरह ही पालतू पशुधनों की देखभाल करते हैं। इसके पहले अपने इष्ट देवी-देवताओं की पूजा होती है।फिर पूरा परिवार रात्रिकालीन भोजन एक साथ करता है।
समाजसेवी पी.डी. खैरवार ने ऐसे स्थानीय पर्वों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि मनुष्य जैसे सामाजिक प्राणी के लिए यह केवल पर्व नहीं, यह पशुधन के प्रति कृतज्ञता है, यह अन्न के प्रति सम्मान है। जब तक भीमा जैसे प्राकृतिक पर्व जिंदा हैं, तब तक मण्डला की आदिवासी संस्कृति को मजबूती मिलती रहेगी। अपने पुरखों से चली आ रही ऐसी परिपाटियों को और ऐसे परंपरागत तीज-त्यौहारों को नहीं भूलना चाहिए, जो भागदौड़ के बीच आराम के बहाने सामाजिक एकता और प्राणियों के प्रति दया भाव व प्रेम का पाठ पढ़ाते हों।
समाजसेवी पी. डी. खैरवार_
