कलेक्टर के निर्देश भी बेअसर? "जांच होगी" का लॉलीपॉप कब तक, जवाब मांग रही जनता
दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला ग्राम पंचायत गौराछापर में अमृत सरोवर योजना के तहत ₹14 लाख 85 हजार की कथित वित्तीय अनियमितता का मामला अब केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिला कलेक्टर के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद एसडीएम नैनपुर कार्यालय में जांच फाइल मानो ठंडे बस्ते में डाल दी गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि 10 जून को आयोजित जनसमस्या शिविर में उन्होंने दस्तावेजों के साथ शिकायत प्रस्तुत की थी। उनका दावा है कि कलेक्टर ने तीन दिन के भीतर जांच दल गठित कर निष्पक्ष जांच कराने के निर्देश दिए थे, लेकिन कई सप्ताह बीत जाने के बाद भी न जांच दल की जानकारी दी गई और न ही जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की गई।
₹14.85 लाख खर्च... लेकिन तालाब आखिर कहां है?
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जिस अमृत सरोवर पर लाखों रुपये खर्च होने का दावा किया गया, उसकी वास्तविक स्थिति मौके पर दिखाई नहीं देती। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सरकारी अभिलेखों में कार्य पूर्ण है तो प्रशासन जनता को बताए कि वह अमृत सरोवर आखिर है कहां?
उनका दावा है कि उनके पास योजना से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं और वे किसी भी निष्पक्ष जांच एजेंसी के समक्ष उन्हें प्रस्तुत करने के लिए तैयार हैं।
एसडीएम कार्यालय के चक्कर... हर बार एक ही जवाब—"जांच होगी"
ग्रामीणों का आरोप है कि वे कई बार एसडीएम कार्यालय पहुंचकर लिखित आवेदन दे चुके हैं, लेकिन हर बार केवल एक ही जवाब मिलता है—"जांच होगी, टीम बनेगी, कार्रवाई होगी।"
अब ग्रामीणों का सब्र टूटता दिखाई दे रहा है। उनका कहना है कि "हमें न्याय नहीं, केवल आश्वासनों का लॉलीपॉप दिया जा रहा है। यदि जांच करनी ही नहीं थी तो कलेक्टर के निर्देशों का क्या मतलब?"
अब जनता पूछ रही है सीधे सवाल
कलेक्टर के निर्देश के बाद जांच दल का गठन हुआ या नहीं?
यदि हुआ, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? यदि गठन नहीं हुआ, तो आदेशों की अनदेखी का जिम्मेदार कौन है?
जिस कार्य पर ₹14.85 लाख खर्च होने का आरोप है, उसकी भौतिक स्थिति क्या है? क्या सरकारी योजनाओं की जांच भी अब केवल फाइलों तक सीमित रह गई है?
जनहित का सवाल, जवाबदेही की परीक्षा
वही अमृत सरोवर जैसी योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण और विकास के उद्देश्य से शुरू की गई थीं। यदि ऐसी योजनाओं में वित्तीय अनियमितता के आरोप लगते हैं और शिकायतों के बावजूद जांच समय पर आगे नहीं बढ़ती, तो इससे केवल सरकारी धन पर ही नहीं बल्कि आम जनता के विश्वास पर भी सवाल खड़े होते हैं।
ग्रामीणों ने मांग की है कि मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कर जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। यदि जांच में किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता सिद्ध होती है तो संबंधित अधिकारियों एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
