हिरदेनगर–कटंगा टोला–लफरा–कान्हा मार्ग पर सफर बना जानलेवा
साढ़े तीन करोड़ की सड़क कुछ ही वर्षों में उखड़ी, पीडब्ल्यूडी की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल*
रेवांचल टाइम्स, मंडला।मंडला जिले के हिरदेनगर से कटंगा टोला, लफरा होते हुए कान्हा राष्ट्रीय उद्यान तक जाने वाला महत्वपूर्ण मार्ग आज अपनी बदहाली के कारण चर्चा का विषय बना हुआ है। वर्ष 2018-19 में लगभग 3.5 (साढ़े तीन) करोड़ रुपए की लागत से निर्मित यह सड़क अब जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढों में तब्दील हो चुकी है। बरसात के मौसम में गड्ढों में पानी भर जाने से राहगीरों को सड़क और गड्ढे में अंतर करना मुश्किल हो जाता है, जिससे हर दिन दुर्घटना का खतरा बना रहता है।
यह मार्ग केवल ग्रामीणों के आवागमन का साधन नहीं, बल्कि बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, व्यापार और कान्हा राष्ट्रीय उद्यान जाने वाले पर्यटकों के लिए भी महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है। इसके बावजूद लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की उदासीनता के कारण सड़क की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण के एक वर्ष बाद ही सड़क उखड़ने लगी थी। इसके बाद केवल खानापूर्ति के रूप में पैचवर्क किया गया, लेकिन स्थायी समाधान कभी नहीं किया गया। अब सड़क की बदहाली हालत देख कर ऐसा लगता हैं कि वाहन चालक हर दिन जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर हैं। इसके साथ ही इस सड़क पर पड़ने वाले गांवों के स्कूली बच्चों, मरीजों और किसानों को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ रही है।
स्थानीय लोगों ने सड़क निर्माण की गुणवत्ता की जांच कराने तथा दोषी अधिकारियों और निर्माण एजेंसी की जवाबदेही तय करने की मांग की है। ग्रामीणों और राहगीरों का कहना है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि सड़क कुछ वर्षों में ही दम तोड़ दे, तो यह केवल सड़क नहीं बल्कि निगरानी व्यवस्था की भी विफलता है।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और लोक निर्माण विभाग से तत्काल तकनीकी निरीक्षण, गड्ढों की मरम्मत तथा आवश्यकता पड़ने पर सड़क के पुनर्निर्माण की मांग की है। साथ ही बरसात के दौरान दुर्घटनाओं से बचाव के लिए चेतावनी संकेतक और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने की भी अपील की है।
*"पीडब्ल्यूडी का नया मॉडल: सड़क कम, गड्ढे ज़्यादा!"*
लोक निर्माण विभाग मंडला की कार्यशैली भी कमाल है। पहले करोड़ों रुपये खर्च कर सड़क बनाई जाती है, फिर कुछ साल बाद उसी सड़क पर गड्ढे उग आते हैं। लगता है विभाग अब डामर नहीं, 'गड्ढा संवर्धन योजना' चला रहा हो जैसे।
हिरदेनगर–कटंगा टोला–लफरा मार्ग पर चलिए, तो ऐसा महसूस होता है जैसे सड़क पर नहीं, 'ऑफ-रोड एडवेंचर पार्क' में प्रवेश कर गए हों। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां रोमांच मुफ्त है और वाहन की मरम्मत का बिल राहगीरों की जेब से चुकाया जाता है।
बरसात में गड्ढों में पानी भरें होने की वजह से राहगीर गिरते उठते इस सड़क पर आना जाना करते है। शायद विभाग की सोच भी यही हो कि "जब सड़क नहीं बची, तो तालाब ही सही।" वाहन चालक अनुमान लगाते रहते हैं कि आगे सड़क है या छोटा-सा जलाशय।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि सड़क टूटने की रफ्तार, उसे सुधारने की सरकारी रफ्तार से कई गुना तेज रही। शिकायतें वर्षों से चल रही हैं, उक्त मार्ग पर बसने वाले गांव वालों ने अनेक बार स्थानीय नेताओं से और विभाग से अपनी मांगे रख चुके हैं पर शायद विभाग किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, ताकि फिर जांच समिति बने, रिपोर्ट आए और उसके बाद अगली बरसात तक फाइलें भीगती रहें।
जनता पूछ रही है—करोड़ों रुपये सड़क बनाने में लगे थे या गड्ढों की नींव डालने में? अगर यही विकास है, तो फिर बदहाली किसे कहेंगे?
पीडब्ल्यूडी से बस एक सवाल:
सड़क जनता के लिए बनाई थी या गड्ढों के संरक्षण के लिए?

