दैनिक रेवांचल टाईम्स - डिंडौरी। बैगा आदिवासी जिले में विकास क्या कहा है ये आज किसी से छिपा नहीं है जहाँ कागजों पर भरपूर विकास हुआ है और उसकी जमी हकीकत पर कोई ध्यान नहीं दे रहा हैं जहाँ जिले के शिक्षा तंत्र की बदहाल तस्वीर एक बार फिर सामने आई है। जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर विकासखंड डिंडौरी के एकीकृत माध्यमिक शाला नयेगांव रैयत में बच्चों की शिक्षा भगवान भरोसे चल रही है। यहां पहली से आठवीं तक की सभी कक्षाएं एक ही छत के नीचे संचालित की जा रही हैं, जबकि स्कूल भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि बच्चों को न केवल असुरक्षित भवन में पढ़ने को मजबूर होना पड़ रहा है, बल्कि शिक्षक भी समय पर विद्यालय नहीं पहुंच रहे हैं।
सुबह करीब 10:30 बजे जब विद्यालय की स्थिति का जायजा लिया गया, तो स्कूल परिसर में एक भी शिक्षक मौजूद नहीं था। मासूम बच्चों ने बताया कि अधिकांश शिक्षक रोजाना जिला मुख्यालय से अप-डाउन करते हैं, जिसके कारण वे अक्सर देर से पहुंचते हैं और निर्धारित समय से पहले ही वापस लौट जाते हैं। नतीजतन, कक्षाएं नियमित रूप से संचालित नहीं हो पातीं और बच्चों की पढ़ाई लगातार प्रभावित हो रही है।
मौके पर मौजूद सहायक शिक्षक अशोक कुमार गवले ने भी स्वीकार किया कि अधिकांश शिक्षक जिला मुख्यालय से आते हैं, इसलिए विद्यालय पहुंचने में देरी हो जाती है। बच्चों ने भी एक स्वर में कहा कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण और नियमित शिक्षा नहीं मिल रही है। उनका आरोप है कि कई बार शिक्षक देर से आने और जल्दी चले जाने के कारण पाठ्यक्रम अधूरा रह जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मध्यप्रदेश शासन के सेवा नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि किसी भी शासकीय कर्मचारी का मुख्यालय वही होगा, जहां उसकी पदस्थापना है, तब आखिर किस आधार पर शिक्षक प्रतिदिन लंबी दूरी तय कर अप-डाउन कर रहे हैं? यदि किसी कर्मचारी को मुख्यालय से बाहर निवास करना है, तो उसे सक्षम अधिकारी की अनुमति लेना अनिवार्य है और यह सुनिश्चित करना भी उसकी जिम्मेदारी है कि उसके आवागमन से शासकीय कार्य प्रभावित न हो।
इतना ही नहीं, स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा लागू डिजिटल उपस्थिति प्रणाली (सार्थक/जीआईएस आधारित व्यवस्था) के तहत शिक्षकों को विद्यालय परिसर या निर्धारित जियो-फेंस के भीतर ही लॉगिन और लॉगआउट करना होता है। निर्धारित कार्यावधि पूरी होने के बाद ही उपस्थिति दर्ज होती है। ऐसे में यदि शिक्षक समय पर विद्यालय नहीं पहुंच रहे हैं और समय से पहले लौट रहे हैं, तो यह व्यवस्था कितनी प्रभावी है, इस पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
दूसरी ओर, जिस भवन में बच्चों को शिक्षा दी जा रही है, उसकी हालत किसी भी समय बड़े हादसे को न्योता दे सकती है। एक ही कमरे में पहली से आठवीं तक के विद्यार्थियों को बैठाकर पढ़ाना न केवल शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है, बल्कि यह बच्चों की सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ है। स्कूल प्रबंधन द्वारा लंबे समय से भवन की मरम्मत और वैकल्पिक व्यवस्था की मांग की जा रही है, लेकिन शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी तंत्र केवल कागजों में शिक्षा सुधार के दावे करेगा, या फिर जमीनी स्तर पर भी बच्चों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में गंभीर पहल होगी? आखिर कब तक मासूम बच्चों का भविष्य जर्जर भवनों और लापरवाह व्यवस्था की भेंट चढ़ता रहेगा? डिंडौरी के नयेगांव रैयत की यह तस्वीर शिक्षा विभाग के उन दावों की पोल खोल रही है, जिनमें बेहतर शिक्षा और आधुनिक व्यवस्थाओं की बातें की जाती हैं।

