निवास नगर परिषद बना 'भूत बंगला', कुर्सियां ड्यूटी पर... साहब सरकारी बंगले में!
जनता कार्यालय के चक्कर काट रही, अधिकारी 15 मिनट में गायब... आखिर किसके भरोसे चल रही नगर परिषद?
दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला/निवासमंडला जिले की निवास नगर परिषद इन दिनों विकास कार्यों से कम और अपनी बदहाल प्रशासनिक व्यवस्था के कारण अधिक चर्चा में है। हालात ऐसे हैं कि जिला कलेक्टर से मिलना तो आसान है, लेकिन नगर परिषद के मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) से मिलना आम नागरिकों के लिए लगभग नामुमकिन हो गया है। दूर-दराज से आने वाले लोग घंटों कार्यालय में इंतजार करते हैं, लेकिन साहब के दर्शन नहीं होते। फोन लगाओ तो कॉल रिसीव नहीं होती, कार्यालय जाओ तो कुर्सी खाली मिलती है।
कार्यालय नहीं, 'भूत बंगला' बन गया नगर परिषद
शुक्रवार को, जब निवास का साप्ताहिक बाजार लगा था और सबसे ज्यादा लोग अपने शासकीय कार्यों के लिए नगर परिषद पहुंचे, तब कार्यालय का दृश्य किसी अवकाश दिवस से कम नहीं था। जिम्मेदार अधिकारियों की कुर्सियां खाली थीं, कई कर्मचारी भी अपने स्थान पर नहीं मिले। जनता निराश होकर बिना काम कराए लौटती रही, लेकिन व्यवस्था को इससे कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आया।
"साहब का ऑफिस में मन नहीं लगता..."
जब रेवांचल टाइम्स की टीम ने दूरभाष के माध्यम से नगर परिषद के एक कर्मचारी से सीएमओ के संबंध में जानकारी चाही, तो जो जवाब मिला, उसने पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी।
कर्मचारी ने बताया कि "साहब कभी-कभार कार्यालय आते हैं। 15-20 मिनट बैठते हैं और फिर अपने सरकारी रूम चले जाते हैं। उनका ऑफिस में मन नहीं लगता। जरूरी फाइलें भी चपरासी सरकारी आवास पर लेकर जाता है। साहब ज्यादा किसी से मिलना-जुलना पसंद नहीं करते और फोन भी नहीं उठाते।"
यदि यह दावा सही है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर नगर परिषद कार्यालय जनता की सेवा के लिए है या सिर्फ औपचारिकता निभाने के लिए?
जनता हलाकान, जनप्रतिनिधि मौन
नगर परिषद की बदहाल व्यवस्था का सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता भुगत रही है। जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, कर संबंधी कार्य, निर्माण अनुमति, शिकायतें और अन्य जरूरी काम लेकर आने वाले लोग दिनभर भटकते रहते हैं।
हैरानी की बात यह है कि नगर परिषद अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और पार्षद भी इस व्यवस्था पर मौन साधे हुए हैं। आखिर जनता ने इन्हें अपनी आवाज बनने के लिए चुना था या प्रशासनिक अव्यवस्था पर चुप रहने के लिए?
जब मुखिया ही गायब, तो कर्मचारी क्यों रहें कार्यालय में?
किसी भी कार्यालय की कार्यसंस्कृति उसके प्रमुख अधिकारी से तय होती है। यदि स्वयं मुख्य अधिकारी नियमित रूप से कार्यालय में उपस्थित नहीं होंगे, तो अधीनस्थ कर्मचारियों से अनुशासन की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यही कारण है कि कई कर्मचारी भी कार्यालय छोड़कर इधर-उधर समय बिताते नजर आते हैं और जनता परेशान होती रहती है।
जिला प्रशासन आखिर कब लेगा संज्ञान?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन बिना सूचना के निवास नगर परिषद का औचक निरीक्षण करेगा? क्या अधिकारियों और कर्मचारियों की वास्तविक उपस्थिति, कार्यप्रणाली और जनता की शिकायतों की निष्पक्ष जांच होगी? या फिर यह पूरा तंत्र इसी तरह सरकारी वेतन लेकर जनता को परेशान करता रहेगा?
रेवांचल टाइम्स के सवाल
क्या मुख्य नगर पालिका अधिकारी का कार्यालय में नियमित बैठना जरूरी नहीं?
यदि साहब सरकारी आवास से ही काम करेंगे तो नगर परिषद कार्यालय की आवश्यकता क्या है?
जनता के समय और पैसे की बर्बादी का जिम्मेदार कौन?
नगर परिषद अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और पार्षद आखिर मौन क्यों हैं?
क्या जिला कलेक्टर इस गंभीर लापरवाही पर कार्रवाई करेंगे या जनता यूं ही कार्यालयों के चक्कर काटती रहेगी?
सरकारी कुर्सियां जनता की सेवा के लिए होती हैं, शोभा बढ़ाने के लिए नहीं। यदि अधिकारी कार्यालय में बैठकर जनता की समस्याएं सुनने को तैयार नहीं हैं, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि जनविश्वास के साथ खिलवाड़ भी है। अब जिला प्रशासन को तय करना होगा कि निवास नगर परिषद जनता के लिए चलेगी या फिर कुछ अधिकारियों की सुविधा के अनुसार।




