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चार पत्र, एक मुलाकात... फिर भी नहीं पसीजा प्रशासन खुले आसमान और पन्नी की झोपड़ी में पढ़ने को मजबूर मासूम,




रेवांचल टाइम्स मंडला शिक्षा को लेकर सरकारें करोड़ों रुपये खर्च करने और "हर बच्चे को बेहतर शिक्षा" देने के दावे करती हैं, लेकिन मंडला जिले की जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। जिला मुख्यालय से महज 12 किलोमीटर दूर स्थित प्राथमिक शाला बुजबुजिया घोड़ाडीह में मासूम बच्चे पिछले चार-पांच वर्षों से पक्के स्कूल भवन के बजाय पन्नी, हरे नेट और लकड़ियों से बनी अस्थायी झोपड़ी के नीचे पढ़ाई करने को मजबूर हैं। बरसात के इस मौसम में जहां बच्चों को सुरक्षित भवन मिलना चाहिए, वहां उनके सिर पर टपकती पन्नी और चारों ओर असुरक्षा का माहौल है।

सबसे हैरानी की बात यह है कि इस समस्या को लेकर 15 मई को अधिकारियों से मुलाकात, 19 मई को कलेक्टर के नाम पत्र और 20 जुलाई को फिर से कलेक्टर सहित सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग, जिला स्रोत समन्वयक (डीपीसी) एवं जिला शिक्षा अधिकारी को ध्यानाकर्षण पत्र सौंपा गया, लेकिन दो महीने बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। सवाल उठता है कि आखिर प्रशासन की संवेदनशीलता कहां खो गई है

जानकारी के अनुसार, 19 मई को शिकायत मिलने के बाद कलेक्टर के निर्देश पर 20 मई से जर्जर भवन के मरम्मत कार्य की शुरुआत भी हुई, लेकिन कुछ ही दिनों बाद काम अचानक बंद हो गया। तब से लेकर आज तक न मरम्मत पूरी हुई और न ही बच्चों के लिए कोई वैकल्पिक सुरक्षित भवन उपलब्ध कराया गया। परिणाम यह है कि नौनिहाल आज भी खुले आसमान और अस्थायी झोपड़ी में बैठकर शिक्षा ग्रहण करने को विवश हैं।

पालक महासंघ के पदाधिकारियों का कहना है कि यह केवल बुजबुजिया घोड़ाडीह का मामला नहीं है, बल्कि मंडला जिले के कई प्राथमिक, माध्यमिक, हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी विद्यालय भी बदहाल स्थिति में संचालित हो रहे हैं। कहीं भवन जर्जर हैं, कहीं शिक्षक नहीं हैं, तो कहीं पीने के पानी, शौचालय, बिजली और फर्नीचर जैसी मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करना केवल कागजी दावा बनकर रह गया है।

पालक महासंघ से जुड़े चंद्रगुप्त नामदेव और पी.डी. खैरवार ने कहा कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों के बच्चों के साथ लगातार अन्याय हो रहा है। बरसात के मौसम में पन्नी और लकड़ियों से बनी झोपड़ी के नीचे पढ़ाई करना किसी भी समय बड़े हादसे को निमंत्रण दे सकता है। तेज बारिश, आंधी या बिजली गिरने जैसी प्राकृतिक परिस्थितियों में इन बच्चों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब जिम्मेदार अधिकारियों को बार-बार लिखित रूप से अवगत कराया जा चुका है, तब भी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही ।क्या प्रशासन किसी अप्रिय घटना का इंतजार कर रहा है यदि किसी मासूम की जान पर बन आई, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा

यह भी चिंता का विषय है कि शिक्षा सत्र शुरू हुए दो महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन जिले के कई विद्यालयों में अब तक पर्याप्त शिक्षकों की पदस्थापना नहीं हो सकी है। कई स्कूलों में एक या दो शिक्षकों के भरोसे पूरी व्यवस्था चल रही है, जबकि कुछ जगहों पर पढ़ाई लगभग ठप होने की स्थिति में है। इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई, मानसिक स्थिति और भविष्य पर पड़ रहा है।

सरकार शिक्षा के अधिकार की बात करती है, लेकिन जब बच्चे सुरक्षित भवन, शिक्षक और बुनियादी सुविधाओं से ही वंचित हों, तो यह अधिकार केवल कागजों तक सीमित नजर आता है। करोड़ों रुपये की योजनाओं और विकास के दावों के बीच यदि मासूम बच्चों को पन्नी की झोपड़ी में बैठकर पढ़ाई करनी पड़े, तो यह पूरे तंत्र की विफलता का प्रमाण है।

पालक महासंघ ने मांग की है कि जिले के सभी जर्जर एवं असुरक्षित विद्यालयों का तत्काल सर्वे कराया जाए, प्राथमिकता के आधार पर स्थायी एवं सुरक्षित भवन उपलब्ध कराए जाएं तथा प्रत्येक विद्यालय में शुद्ध पेयजल, बिजली, शौचालय, फर्नीचर, खेल मैदान और पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराए जाएं। साथ ही जिन विद्यालयों में मरम्मत कार्य अधूरा छोड़ दिया गया है, उसे तत्काल पूरा कराया जाए ताकि बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा दोनों सुनिश्चित हो सकें।

यदि समय रहते प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं होगी, बल्कि उन मासूम बच्चों के भविष्य के साथ अन्याय भी होगा, जिनके सपने आज भी पन्नी की छत के नीचे दम तोड़ रहे हैं।

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