मंडला मंडला जिले की पशु चिकित्सा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। विकासखंडों में डॉक्टरों और सहायक स्टाफ की भारी कमी के कारण पशुपालक अपने बीमार पशुओं को लेकर भटकते फिर रहे हैं, लेकिन इलाज का कोई ठोस इंतजाम नहीं। सरकार की ओर से पशुपालकों के लिए ढेरों योजनाएं चलाई जा रही हैं—राशन, बीमा, सब्सिडी—लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पशु बीमार पड़ते ही मौत की आगोश में चले जाते हैं। यह न सिर्फ पशुपालकों की कमर तोड़ रहा है, बल्कि जिले की अर्थव्यवस्था को भी घुटनों पर ला खड़ा कर रहा है।
उपसंचालक पशु चिकित्सा विभाग यूएस तिवारी ने स्पष्ट स्वीकार किया कि हाल ही में 8 डॉक्टरोंऔर 9 सहायक डॉक्टरों का मंडला से बाहर स्थानांतरण हो गया है। बदले में सिर्फ 2 डॉक्टर आए हैं। नतीजा? एक-एक डॉक्टर पर 2-3 विकासखंडों का अतिरिक्त प्रभार, जिससे वे न तो समय पर पहुंच पा रहे हैं और न ही प्रभावी इलाज दे पा रहे हैं। घुघरी, मवई, बिछिया, निवास जैसे दुर्गम विकासखंडों में तो स्थिति और भी भयावह है। यहां पशु चिकित्सक पहुंच ही नहीं पाते, और पशुपालक मजबूरन घरेलू नुस्खों या बिना इलाज के दिन काट रहे हैं।
जनकल्यान योजनाओं का मजाक
एक तरफ सरकार “पशुधन विकास” और “किसान कल्याण” के नारे लगाती है, वहीं दूसरी तरफ मंडला जैसे आदिवासी बहुल जिले से अनुभवी डॉक्टरों को लगातार खींच लिया जा रहा है। मंडला जिला आदिवासी बहुल है, जहां पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। गाय-भैंस, बकरी, मुर्गी—ये परिवारों की आय का मुख्य साधन हैं। लेकिन जब पशु बीमार पड़ते हैं तो न सरकारी अस्पताल काम करता है, न कोई प्राइवेट क्लिनिक उपलब्ध है। इंसान तो किसी तरह प्राइवेट डॉक्टर के पास पहुंच जाता है, लेकिन बेजुबान पशु? उनके लिए तो मौत ही एकमात्र विकल्प बचा है।
पशुपालकों की पीड़ा सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। एक पशुपालक ने बताया, “बीमार गाय को लेकर 20-25 किलोमीटर दूर ले गए, लेकिन वहां डॉक्टर नहीं मिला। दो दिन बाद गाय दम तोड़ गई। अब परिवार का एकमात्र सहारा चला गया।” ऐसे सैकड़ों मामले रोज सामने आ रहे हैं। लू के मौसम में पशुओं को बचाने की एडवाइजरी जारी होती है, लेकिन बुनियादी चिकित्सा सुविधा ही गायब है तो ये एडवाइजरी सिर्फ कागजी खानापूर्ति साबित होती हैं।
मंडला की सच्चाई: स्टाफ की भारी कमी
मंडला जिले में पशु चिकित्सा केंद्रों की संख्या नाममात्र की है, लेकिन स्टाफ की स्थिति दयनीय। कई केंद्रों पर लंबे समय से पद खाली पड़े हैं। स्थानांतरण की इस बेलगाम नीति ने व्यवस्था को और कमजोर कर दिया है। पशुधन की बीमारियां बढ़ रही हैं, संक्रामक रोग फैलने का खतरा मंडरा रहा है, लेकिन विभाग की नींद नहीं टूट रही।
सवाल उठता है— क्या सरकार आदिवासी इलाकों को जानबूझकर उपेक्षित रखना चाहती है? पशुपालन योजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन फील्ड में डॉक्टर नहीं हैं तो ये योजनाएं किस काम की? पशु मरेंगे तो दूध, मांस, खेती-किसानी सब प्रभावित होगी। यह न सिर्फ पशुपालकों का आर्थिक सफाया है, बल्कि पूरे जिले की विकास गाथा पर तमाचा है।
