15 साल से अधूरा पड़ा पंडरीपानी का छात्रावास भवन, लाखों की सरकारी राशि बर्बादी की कगार पर
40 सीटर बालक छात्रावास बनना था, कमरे और छत तैयार होने के बाद रुक गया निर्माण; अब खिड़की-दरवाजे टूटे, दीवारों में दरारें
दैनिक रेवांचल टाइम्स, बजाग। करंजिया विकासखंड के वनग्राम पंडरीपानी में वर्षों पूर्व लाखों रुपए की लागत से बनाया गया छात्रावास भवन करीब 15 वर्षों से अधूरा पड़ा है। लंबे समय से उपयोग में नहीं आने के कारण भवन धीरे-धीरे जर्जर होता जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण आखिर किस कारण बंद हुआ और इसे आज तक पूरा कर उपयोग में क्यों नहीं लाया गया, इसकी स्पष्ट जानकारी उन्हें भी नहीं है।
ग्रामीणों के अनुसार भवन का निर्माण बालक छात्रावास के लिए कराया जा रहा था। भवन के कमरे तैयार हो चुके थे और छत की ढलाई भी हो गई थी, लेकिन इसके बाद शेष निर्माण कार्य अधूरा छोड़ दिया गया। बताया जा रहा है कि करीब दो वर्ष तक काम चलने के बाद निर्माण पूरी तरह बंद हो गया।
खिड़की-दरवाजे टूट रहे, दीवारों में पड़ी बड़ी दरारें
करीब डेढ़ दशक से अधूरे पड़े भवन की स्थिति अब लगातार खराब होती जा रही है। खिड़कियां और दरवाजे क्षतिग्रस्त हो रहे हैं, दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें दिखाई देने लगी हैं और छत पर घास उग आई है। भवन के आसपास झाड़ियां फैल जाने से परिसर भी उपेक्षा की तस्वीर पेश कर रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते भवन की मरम्मत, सुरक्षा और उपयोग की दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो यह संरचना पूरी तरह जर्जर हो सकती है।
ग्रामीणों के मुताबिक भवन पूरा होने के बाद यहां करीब 40 सीटर बालक छात्रावास संचालित किया जाना था। लेकिन निर्माण अधूरा रह जाने के कारण छात्रावास कभी शुरू ही नहीं हो सका। जिस उद्देश्य से सरकारी राशि खर्च की गई, वह उद्देश्य आज तक पूरा नहीं हो पाया।
लाखों खर्च, लेकिन विद्यार्थियों को नहीं मिला लाभ
ग्रामीणों का कहना है कि भवन निर्माण में उस समय लाखों रुपए खर्च किए गए थे। वर्तमान परिस्थितियों में इसकी कीमत करीब 30 से 40 लाख रुपए के आसपास हो सकती है। हालांकि वास्तविक लागत और वर्तमान मूल्य की पुष्टि संबंधित विभागीय अभिलेखों से ही हो सकेगी।
सवाल यह है कि इतनी बड़ी राशि खर्च कर भवन खड़ा करने के बाद उसे उपयोग में क्यों नहीं लाया गया और वर्षों तक उसकी देखरेख क्यों नहीं की गई।
● निर्माण किस एजेंसी से कराया गया था?
● कितनी राशि स्वीकृत हुई और कितना भुगतान किया गया?
● काम बीच में क्यों रोका गया?
● शेष निर्माण पूरा कराने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
● 15 वर्षों तक भवन की देखरेख किसकी जिम्मेदारी थी?
क्या होगी तकनीकी जांच?
अब भवन की वर्तमान स्थिति को देखते हुए तकनीकी जांच की जरूरत भी महसूस की जा रही है। यह देखना जरूरी होगा कि इतने वर्षों तक खुले और अधूरे रहने के बाद भवन अभी उपयोग योग्य है या इसके लिए बड़े स्तर पर मरम्मत और पुनर्निर्माण की आवश्यकता होगी।
यदि भवन संरचनात्मक रूप से सुरक्षित पाया जाता है तो इसे पूरा कर मूल उद्देश्य के अनुरूप छात्रावास के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है। वहीं यदि भवन गंभीर रूप से जर्जर हो चुका है तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि सरकारी राशि के संभावित नुकसान की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की जाएगी।
ग्रामीणों ने मांग की है कि प्रशासन भवन से जुड़ी स्वीकृति, निर्माण एजेंसी, भुगतान, कार्य प्रगति और काम बंद होने के कारणों की जांच कराए। साथ ही भवन को पूरा कर उपयोग में लाने अथवा उसके संरक्षण को लेकर स्पष्ट निर्णय लिया जाए।
लाखों रुपए खर्च कर बनाया गया छात्रावास यदि 15 साल तक किसी विद्यार्थी के काम ही नहीं आया, तो इस सरकारी धन की बर्बादी की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
