मजदूर मां की बेटी सुषमा बनी असिस्टेंट प्रोफेसर, संघर्ष और मेहनत से हासिल की बड़ी सफलता
बिना बड़ी कोचिंग के MPPSC परीक्षा में सफलता; खेतों में मजदूरी, मनरेगा और नाइट ड्यूटी के बीच जारी रखी पढ़ाई
दैनिक रेवाँचल टाईम्स, मंडला। आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले के ग्राम सुकतरा-कन्हारी की बेटी सुषमा मरावी ने कठिन परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बीच एमपीपीएससी असिस्टेंट प्रोफेसर परीक्षा उत्तीर्ण कर प्रेरणादायक सफलता हासिल की है। एक निरक्षर मजदूर मां की बेटी का यह सफर गांव की बेटियों के लिए उम्मीद और हौसले की मिसाल बन गया है।
बिछिया विकासखंड के सुकतरा गांव में जन्मी सुषमा के पिता स्व. पंचू मरावी वाहन चालक थे, जबकि मां नन्हीं मरावी मजदूरी कर परिवार चलाती हैं। वर्ष 2010 में पिता के निधन के बाद परिवार पर आर्थिक संकट और गहरा गया, लेकिन सुषमा ने पढ़ाई का रास्ता नहीं छोड़ा।
पढ़ाई के लिए बच्चों को पढ़ाया, खेतों और मनरेगा में भी किया काम
आर्थिक परिस्थितियां कठिन थीं, इसलिए सुषमा ने अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए बच्चों को कोचिंग पढ़ाई। इसके साथ ही खेतों में मजदूरी की, मनरेगा में काम किया और पार्लर का काम भी सीखा।
संघर्ष के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। प्रारंभिक शिक्षा सरस्वती ज्ञान मंदिर बिछिया और शासकीय विद्यालय माधोपुर से हुई। 11वीं और 12वीं की पढ़ाई उत्कृष्ट विद्यालय मंडला से जीवविज्ञान विषय में की। वर्ष 2016 में उन्होंने रानी दुर्गावती महाविद्यालय से बीए की डिग्री प्राप्त की।
वर्ष 2017-18 में सुषमा का पुलिस कांस्टेबल पद के लिए चयन हुआ, लेकिन मेडिकल परीक्षण में वे बाहर हो गईं। यह उनके लिए बड़ा झटका था, फिर भी उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी दिशा बदलकर पढ़ाई जारी रखी।
भोपाल में नाइट ड्यूटी और साथ-साथ एमए
इसके बाद सुषमा भोपाल पहुंचीं और डायल-100 तथा 108 सेवा में कॉल टेकर के रूप में काम किया। नाइट ड्यूटी के बीच उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में एमए किया।
नौकरी, पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी को एक साथ संभालना आसान नहीं था, लेकिन लगातार मेहनत और अनुशासन ने उन्हें असिस्टेंट प्रोफेसर परीक्षा की तैयारी से जुड़े रहने की ताकत दी।
मामा की अंतिम इच्छा बनी सबसे बड़ी प्रेरणा
सुषमा के जीवन में उनके मामा स्व. गुलाब सिंह उइके की महत्वपूर्ण भूमिका रही। परिवार के अनुसार वे लगातार सुषमा को आगे पढ़ने और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता पाने के लिए प्रेरित करते रहे।
वर्ष 2024 में परीक्षा से ठीक एक दिन पहले उनके मामा का निधन हो गया। सुषमा के मुताबिक उनकी अंतिम इच्छा थी कि एक दिन सुषमा का नाम अखबार में आए, ताकि गांव के दूसरे परिवार भी अपनी बेटियों को पढ़ाने के लिए प्रेरित हों।
“मां निरक्षर हैं, मजदूरी करती हैं। मैंने कोई बड़ी कोचिंग नहीं की। यह सफलता मेरी नहीं, बल्कि मेरी मां और मामा की है।”
गांव की बेटियों के लिए बनी प्रेरणा
सुषमा की सफलता इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने संसाधनों की कमी को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। पढ़ाई के साथ मजदूरी, छोटी नौकरियां और लगातार परीक्षा की तैयारी करते हुए उन्होंने अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाए।
उनकी सफलता यह संदेश देती है कि कठिन परिस्थितियां रास्ता जरूर मुश्किल कर सकती हैं, लेकिन मजबूत संकल्प, परिवार का सहयोग और शिक्षा के प्रति समर्पण लक्ष्य तक पहुंचने की राह बना सकते हैं।
