वैश्य टेकरी के नीचे छिपा उज्जैन का बौद्ध अतीत? 1938-39 की खुदाई के बाद अब वैज्ञानिक पड़ताल की जरूरत
पुराने उत्खनन में विशाल स्तूप के संकेत; मौर्यकाल, अशोक, व्यापारी समुदाय और उज्जैन की प्राचीन बौद्ध परंपरा से जुड़े सवालों के जवाब आधुनिक पुरातत्व से मिलने की उम्मीद
दैनिक रेवाँचल टाईम्स, उज्जैन। उज्जैन का इतिहास केवल धार्मिक आस्था और मंदिरों की परंपरा तक सीमित नहीं है। प्राचीन अवंति की राजधानी उज्जयिनी राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रही है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में वैश्य टेकरी का पुरातात्विक महत्व सामने आता है।
लगभग नौ दशक पहले हुई खुदाई ने संकेत दिए थे कि वैश्य टेकरी कोई सामान्य प्राकृतिक टीला नहीं, बल्कि एक विशाल मानव-निर्मित बौद्ध स्मारक हो सकती है। अब इस स्थल पर आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से पुनः अध्ययन और उत्खनन की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।
तत्कालीन ग्वालियर राज्य के पुरातत्व विभाग द्वारा 1938-39 में किए गए उत्खनन में वैश्य टेकरी को एक विशाल स्तूपीय संरचना के रूप में दर्ज किया गया था। पुराने विवरणों में इसके आधार को लगभग 350 फीट और अनुमानित ऊंचाई को करीब 100 फीट बताया गया।
क्या यह सांची से भी बड़ा था?
पुराने विवरणों के आधार पर वैश्य टेकरी को सांची के महान स्तूप से अधिक विशाल बताया गया है। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से इस तुलना को सावधानी के साथ देखना जरूरी है। वर्तमान में स्तूप की मूल ऊंचाई, वास्तु योजना और निर्माण चरणों की अंतिम पुष्टि आधुनिक उत्खनन के बाद ही संभव होगी।
पुराने उत्खनन विवरण में बताया गया कि स्तूप के भीतर स्थानीय मुरम को मजबूती से दबाकर भराव तैयार किया गया था, जबकि बाहरी हिस्से में ईंटों की चिनाई की गई थी। बड़ी ईंटों के साथ पंच-चिह्नित सिक्के और अवंति क्षेत्र से संबंधित मुद्रा मिलने का उल्लेख भी मिलता है।
मौर्यकालीन होने की संभावना, लेकिन अशोक से सीधा संबंध अभी सिद्ध नहीं
ईंटों के आकार और सिक्कों के आधार पर पुराने पुरातत्वविदों ने इस संरचना को तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व यानी मौर्यकाल से जोड़ने की संभावना जताई थी। हालांकि किसी संरचना का मौर्यकालीन होना और उसका सीधे सम्राट अशोक द्वारा निर्मित होना दो अलग-अलग ऐतिहासिक दावे हैं।
इसीलिए वैश्य टेकरी को अशोक से जोड़ने वाले दावों को अभी संभावना के रूप में ही देखा जाना चाहिए। निर्णायक निष्कर्ष के लिए शिलालेख, पुरातात्विक परतें, स्थापत्य अवशेष और वैज्ञानिक काल-निर्धारण जैसे स्वतंत्र प्रमाण आवश्यक होंगे।
उज्जैन और अशोक का पुराना संबंध
ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार अशोक अपने पिता बिंदुसार के शासनकाल में अवंति क्षेत्र के प्रशासन से जुड़ा था और उज्जैन उस समय एक महत्वपूर्ण व्यापारिक एवं शहरी केंद्र था। ऐसे में यदि यहां मौर्यकाल में विशाल बौद्ध स्मारक विकसित हुआ, तो उसे तत्कालीन राजनीतिक संरक्षण, व्यापारी समुदाय और बौद्ध संघ की गतिविधियों के व्यापक संदर्भ में देखना होगा।
बौद्ध और श्रीलंकाई परंपराओं में अशोक की पत्नी देवी को विदिशा के व्यापारी परिवार से जोड़ा जाता है। बाद की स्थानीय परंपराओं में वैश्य टेकरी के नाम को भी इस कथा से जोड़ा गया, लेकिन केवल स्थलनाम किसी स्मारक के निर्माणकर्ता या उसके काल का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
कुम्हार टेकरी भी बढ़ाती है पूरे क्षेत्र का महत्व
वैश्य टेकरी के निकट स्थित कुम्हार टेकरी भी इस पुरातात्विक परिदृश्य को महत्वपूर्ण बनाती है। उपलब्ध अध्ययनों में आसपास छोटी-बड़ी स्तूपीय संरचनाओं की चर्चा मिलती है। इसलिए भविष्य का उत्खनन केवल मुख्य टीले तक सीमित रखने के बजाय आसपास के संभावित मठ, आवासीय क्षेत्र और अन्य संरचनाओं तक विस्तारित किया जाना उपयोगी हो सकता है।
प्राचीन इंजीनियरिंग का भी मिल सकता है बड़ा प्रमाण
पुरानी रिपोर्टों में स्तूप की निर्माण तकनीक को भी असाधारण बताया गया है। विशाल भराव का दबाव झेलने के लिए आधार की निचली चिनाई को विशेष संरचनात्मक रूप देने का उल्लेख मिलता है। यदि आधुनिक उत्खनन में इसकी पुष्टि होती है तो यह प्राचीन भारतीय निर्माण और अभियंत्रण क्षमता के अध्ययन में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
आज पुरातत्व के पास ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR), ड्रोन सर्वेक्षण, GIS, 3D फोटोग्रामेट्री, भू-स्थानिक मानचित्रण और वैज्ञानिक डेटिंग जैसी आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हैं। इनके माध्यम से भूमिगत संरचनाओं की पहचान और स्थल का विस्तृत डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है।
सबसे अहम होगी पुरातात्विक परतों की जांच
आधुनिक पुरातत्व में केवल किसी सिक्के, ईंट या अन्य वस्तु का मिलना पर्याप्त नहीं माना जाता। यह भी जरूरी है कि वह किस पुरातात्विक परत में मिली, उसके साथ कौन-सी सामग्री थी और वह संरचना के किस निर्माण चरण से संबंधित है।
इसलिए 1938-39 में मिले सिक्कों और ईंटों को महत्वपूर्ण संकेत मानते हुए नई खुदाई में उनके संदर्भ और कालक्रम की दोबारा वैज्ञानिक जांच आवश्यक होगी।
व्यापार और बौद्ध धर्म के रिश्ते पर भी खुल सकते हैं नए अध्याय
प्राचीन उज्जैन बड़े व्यापारिक मार्गों से जुड़ा हुआ था। भारत के अनेक क्षेत्रों में व्यापारी समुदाय और बौद्ध संघों के बीच घनिष्ठ संबंधों के पुरातात्विक प्रमाण मिलते हैं। यदि वैश्य टेकरी से दानदाताओं, भिक्षुओं या व्यापारिक गतिविधियों से जुड़ी सामग्री मिलती है, तो उज्जैन के आर्थिक और धार्मिक इतिहास के बीच संबंध को समझने का नया अवसर मिलेगा।
किसी बड़े पुरातात्विक स्थल की खुदाई केवल मिट्टी हटाने का काम नहीं है। स्थल की सीमा, सुरक्षा, भूमि स्वामित्व, जल निकासी, आधुनिक निर्माण, उत्खनित अवशेषों के संरक्षण और सार्वजनिक प्रस्तुति की भी दीर्घकालिक योजना जरूरी होगी।
पर्यटन से पहले संरक्षण और वैज्ञानिक शोध
वैश्य टेकरी पर व्यवस्थित शोध से उज्जैन के सांस्कृतिक पर्यटन, विश्वविद्यालयीय अध्ययन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिल सकता है। लेकिन सबसे पहले उत्खनित अवशेषों को मौसम, अतिक्रमण और मानवीय हस्तक्षेप से सुरक्षित रखने की व्यवस्था करनी होगी।
भविष्य में स्थल पर वैज्ञानिक सूचना-पट्ट, डिजिटल अभिलेख, शोध केंद्र और संग्रहालयीय प्रस्तुति विकसित करने की संभावनाएं भी बन सकती हैं।
वैश्य टेकरी के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि यहां सांची से बड़ा स्तूप था या नहीं। असली सवाल यह है कि इस विशाल संरचना का निर्माण कब हुआ, किसने कराया, किन सामाजिक समूहों ने सहयोग दिया और यह उज्जैन के प्राचीन जीवन में किस भूमिका में था।
लगभग नौ दशक पहले जिसने पुरातत्वविदों को चकित किया था, वही वैश्य टेकरी आज एक बार फिर शोधकर्ताओं के सामने सवाल बनकर खड़ी है। इन सवालों का उत्तर लोककथा या अनुमान से नहीं, बल्कि व्यवस्थित वैज्ञानिक उत्खनन, संरक्षण और प्रमाण-आधारित इतिहास से ही सामने आ सकेगा।
