मेरी पहली ऑनलाइन RTI, पढ़ो सरकार ने उसे कैसे घुमाई!
कचहरियों में घूमता भ्रष्टाचार का कायदा: सूचना मांगने से द्वितीय अपील तक की मेरी कहानी
दैनिक रेवांचल टाइम्स | विशेष आलेख। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही का महत्वपूर्ण माध्यम है। इस कानून ने आम नागरिक को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज सूचनाएं मांगने का अधिकार दिया। लेकिन जब सूचना मांगने के बाद भी जवाब नहीं मिलता, अपील करनी पड़ती है और आदेश के बावजूद जानकारी मिलने में देरी होती है, तो नागरिक के मन में व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठते हैं।
मैंने अपनी पहली ऑनलाइन RTI इसी विश्वास के साथ लगाई थी कि सरकारी योजनाओं की जानकारी मुझे नियमानुसार उपलब्ध हो जाएगी। लेकिन मेरे अनुभव ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि जब एक सामान्य नागरिक को सार्वजनिक धन के उपयोग का विवरण जानने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़े, तो पारदर्शिता का उद्देश्य आखिर कैसे पूरा होगा?
मेरी यह कहानी किसी काल्पनिक घटना पर आधारित नहीं है। यह मेरे द्वारा किए गए RTI आवेदन और उसके बाद की अपील प्रक्रिया से जुड़ा व्यक्तिगत अनुभव है। साथ ही, इसमें सरकारी मकान सहायता के वितरण को लेकर मेरी कुछ गंभीर आशंकाएं भी शामिल हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।
RTI की शुरुआत: आखिर क्यों मांगी सरकारी सहायता की जानकारी?
सूचना का अधिकार कानून का मूल उद्देश्य नागरिकों को सरकारी कामकाज की जानकारी देकर व्यवस्था को जवाबदेह बनाना है। सरकार द्वारा चलाई जाने वाली योजनाओं में खर्च होने वाला धन सार्वजनिक संसाधनों से आता है। इसलिए नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि योजनाओं का लाभ किन पात्र व्यक्तियों तक पहुंच रहा है और निर्धारित नियमों का पालन किया जा रहा है या नहीं।
मुझे तहसील क्षेत्र में मकान निर्माण के लिए दी जाने वाली सरकारी सहायता के वितरण में संभावित अनियमितताओं की जानकारी मिली थी। इसी कारण मैंने संबंधित लाभार्थियों की सूची और सहायता वितरण का विवरण मांगने का निर्णय लिया।
मेरा उद्देश्य यह समझना था कि ₹3.50 लाख की सहायता किन लोगों को दी गई, पात्रता का निर्धारण कैसे हुआ और क्या योजना के नियमों का पालन किया गया।
ऑनलाइन RTI: सुविधा तो मिली, लेकिन सूचना का इंतजार खत्म नहीं हुआ
डिजिटल व्यवस्था ने RTI आवेदन की प्रक्रिया को पहले से अधिक सुविधाजनक बनाया है। ऑनलाइन आवेदन के माध्यम से नागरिक घर बैठे जानकारी मांग सकते हैं और आवेदन की स्थिति पर नजर रख सकते हैं।
मेरा मानना है कि सरकारी योजनाओं की लाभार्थी सूची, स्वीकृत राशि और अन्य सार्वजनिक किए जा सकने वाले विवरण संबंधित विभागों की वेबसाइटों पर नियमित रूप से उपलब्ध होने चाहिए। इससे नागरिकों को बार-बार आवेदन करने की आवश्यकता कम होगी।
जो जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है, उसे प्राप्त करने के लिए नागरिकों को बार-बार अपील क्यों करनी पड़े?
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4 में सरकारी संस्थाओं द्वारा निर्धारित श्रेणियों की सूचनाएं स्वतः प्रकाशित करने का प्रावधान है। यदि विभाग नियमित रूप से ऐसी जानकारी सार्वजनिक करें, तो पारदर्शिता बढ़ेगी और RTI आवेदनों की संख्या भी कम हो सकती है।
21 जून 2026 को लगाई पहली RTI, फिर शुरू हुआ इंतजार
मैंने 21 जून 2026 को ऑनलाइन RTI आवेदन प्रस्तुत किया। इसमें तहसील क्षेत्र में मकान निर्माण सहायता के अंतर्गत लाभ प्राप्त करने वाले लोगों की सूची और संबंधित विवरण मांगे थे।
मुझे आशंका थी कि योजना में कुछ अपात्र लोगों को लाभ मिला हो सकता है। कुछ परिवारों के सदस्यों को अलग-अलग दर्शाकर एक से अधिक बार सहायता दिए जाने तथा पहले से निर्मित या वास्तव में निर्माण न होने वाले मकानों के नाम पर भुगतान किए जाने की संभावनाओं की जानकारी भी मेरे सामने आई थी।
मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि ये मेरी आशंकाएं हैं। इनकी पुष्टि संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, लाभार्थियों की पात्रता और भुगतान विवरण की जांच से ही हो सकती है। इसी कारण मैंने दस्तावेजी जानकारी मांगी थी।
मकान निर्माण सहायता की लाभार्थी सूची और वितरण विवरण मांगा।
मेरे अनुसार, सामान्य 30 दिन की अवधि में मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई।
प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष अपील की। मेरे अनुसार, अधिकारी ने सूचना देने का आदेश जारी किया।
प्रथम अपील के बाद भी सूचना नहीं मिलने पर गुजरात राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील की, जो मेरे अनुसार लंबित है।
प्रथम अपील में आदेश मिला, फिर भी जानकारी क्यों नहीं?
निर्धारित समय में सूचना नहीं मिलने पर मैंने प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष अपील की। मेरे अनुसार, अधिकारी ने मामले में जानकारी उपलब्ध कराने का आदेश दिया।
इसके बावजूद मुझे मांगी गई सूचना नहीं मिली। यह मेरे लिए सबसे अधिक निराशाजनक अनुभव रहा। यदि अपील के बाद भी नागरिक को जानकारी प्राप्त नहीं होती, तो उसे अगली कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, जिसमें अतिरिक्त समय और प्रयास लगता है।
अब मैंने गुजरात राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील प्रस्तुत की है। मुझे उम्मीद है कि आयोग मेरे आवेदन, विभागीय जवाब और प्रथम अपील के आदेश का परीक्षण कर उचित निर्णय देगा।
मेरा यह भी मानना है कि जहां कानून के अनुसार सूचना देने में देरी हुई है, वहां निःशुल्क सूचना उपलब्ध कराने के प्रावधान पर भी विचार होना चाहिए।
RTI कार्यकर्ताओं को संदेह की नजर से क्यों देखा जाता है?
समाज में कई बार सूचना मांगने वाले नागरिकों और RTI कार्यकर्ताओं को संदेह की नजर से देखा जाता है। कुछ मामलों में उनके उद्देश्य पर सवाल उठाए जाते हैं। लेकिन केवल सरकारी रिकॉर्ड मांगने के आधार पर किसी व्यक्ति को गलत ठहराना उचित नहीं है।
मेरा सवाल सीधा है—यदि मकान निर्माण सहायता पात्र लाभार्थियों को नियमानुसार दी गई है, तो उससे संबंधित सार्वजनिक किए जा सकने वाले रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में अनावश्यक देरी क्यों हो?
निश्चित रूप से प्रत्येक RTI आवेदन का परीक्षण कानून के अनुसार होना चाहिए और व्यक्तिगत गोपनीयता से संबंधित प्रावधानों का भी पालन होना चाहिए। लेकिन पारदर्शिता की मांग को अनावश्यक रूप से बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
किसी योजना में अनियमितता हुई है या नहीं, इसका फैसला आरोपों से नहीं बल्कि दस्तावेजों, निष्पक्ष जांच और संबंधित कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए। सरकारी रिकॉर्ड तक नियमानुसार पहुंच इसी प्रक्रिया की महत्वपूर्ण शुरुआत है।
गुजरात की प्रशासनिक व्यवस्था से मेरी शिकायत और आशंकाएं
अपने अनुभव के आधार पर मुझे लगता है कि सरकारी योजनाओं की जानकारी उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में गंभीर सुधार की आवश्यकता है। जब आवेदन के बाद अपील करनी पड़े और फिर भी रिकॉर्ड न मिले, तो नागरिक के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
मुझे आशंका है कि मकान निर्माण सहायता के वितरण में कुछ स्तरों पर अनियमितताएं हुई हो सकती हैं। लाभार्थियों के चयन, स्वीकृति, निर्माण की वास्तविक स्थिति और भुगतान प्रक्रिया की जांच से इन आशंकाओं का समाधान हो सकता है।
मैंने अपने अनुभव में अधिकारियों तथा प्रभावशाली लोगों की संभावित भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि, किसी अधिकारी, राजनीतिक व्यक्ति या लाभार्थी की मिलीभगत का निष्कर्ष स्वतंत्र जांच और ठोस साक्ष्यों के बिना नहीं निकाला जा सकता।
मेरी मांग है कि संबंधित विभाग सहायता वितरण का पूरा रिकॉर्ड नियमानुसार उपलब्ध कराए और यदि उसमें कोई अनियमितता सामने आती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच हो।
RTI कानून में जवाबदेही का प्रावधान, फिर भी इतनी परेशानी क्यों?
सूचना का अधिकार अधिनियम केवल जानकारी मांगने का माध्यम नहीं है, बल्कि इसमें आवेदन, अपील और जवाबदेही की कानूनी व्यवस्था भी है।
सामान्य परिस्थितियों में जन सूचना अधिकारी को आवेदन प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर निर्णय देना होता है। कानून की धारा 7(6) में निर्धारित समयसीमा का पालन न होने की स्थिति में सूचना निःशुल्क उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
वहीं धारा 20 के अंतर्गत सूचना आयोग, कानून में निर्धारित परिस्थितियों और प्रक्रिया के अनुसार, जिम्मेदार जन सूचना अधिकारी पर अर्थदंड लगाने पर विचार कर सकता है। प्रत्येक देरी पर दंड स्वतः नहीं लगता; इसका निर्णय आयोग संबंधित तथ्यों के आधार पर करता है।
मेरा मानना है कि इन प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है, ताकि सूचना मांगने वाले नागरिकों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।
कचहरियों में घूमता भ्रष्टाचार का कायदा!
जब नागरिक को अपने ही अधिकार के लिए लगातार अपील करनी पड़े, तो व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मेरी मांग: जानकारी दी जाए, आशंकाओं की निष्पक्ष जांच हो
मैं चाहता हूं कि मकान निर्माण सहायता से संबंधित मांगी गई जानकारी मुझे कानून के अनुसार उपलब्ध कराई जाए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन लाभार्थियों को सहायता मिली और क्या चयन तथा भुगतान में निर्धारित नियमों का पालन किया गया।
यदि रिकॉर्ड में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि सभी भुगतान सही पाए जाते हैं, तो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जा सकने वाली तथ्यात्मक जानकारी नागरिकों की शंकाओं को दूर करने में मदद करेगी।
सूचना का अधिकार लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसे प्रभावी बनाए रखना केवल आवेदकों की नहीं, बल्कि सरकारी विभागों और सूचना आयोगों की भी जिम्मेदारी है।
मेरी पहली RTI से शुरू हुआ यह संघर्ष अभी जारी है। मुझे उम्मीद है कि कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से मांगी गई जानकारी मिलेगी और सच सामने आएगा।
जय हिन्द। जय भारत।
प्रतिक संघवी, राजकोट, गुजरात। यह आलेख लेखक के प्रथम ऑनलाइन RTI आवेदन, सूचना प्राप्त करने के प्रयास और अपील प्रक्रिया से जुड़े उनके व्यक्तिगत अनुभव तथा विचारों पर आधारित है।
आलेख में सरकारी सहायता वितरण में भ्रष्टाचार, संभावित मिलीभगत तथा सूचना रोके जाने संबंधी बातें लेखक के आरोप, आशंकाएं और निजी अनुभव हैं। संबंधित RTI आवेदन, अपील आदेश, विभागीय रिकॉर्ड तथा कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र पुष्टि इस आलेख के लिए उपलब्ध नहीं कराई गई है। किसी व्यक्ति या विभाग की दोषसिद्धि का निष्कर्ष नहीं निकाला गया है।
