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छिंदवाड़ा के दुर्गा मंदिर में महाष्टमी पर पंचकुण्डीय हवन संपन्न, 1200 साल पुरानी बताई जाती है मां सिद्धिदात्री की प्रतिमा

छिंदवाड़ा | शारदीय नवरात्र विशेष

छिंदवाड़ा के दुर्गा मंदिर में महाष्टमी पर पंचकुण्डीय हवन संपन्न, 1200 साल पुरानी बताई जाती है मां सिद्धिदात्री की प्रतिमा

19 अक्टूबर को महानवमी पर कन्या पूजन, भंडारा और कलश विसर्जन; प्राचीन मान्यताओं और साधना परंपरा से जुड़ा है स्वामी शिवोम् तीर्थ कुण्डलिनी महायोग आश्रम

दैनिक रेवांचल टाइम्स | छिंदवाड़ा

छिंदवाड़ा। शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर साउथ सिविल लाइन, गुरैया रोड स्थित स्वामी शिवोम् तीर्थ कुण्डलिनी महायोग आश्रम के दुर्गा मंदिर में महाष्टमी पर पंचकुण्डीय हवन का आयोजन श्रद्धा, भक्ति और विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ।

सुबह से ही मंदिर परिसर में माता रानी के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालुओं का आगमन होता रहा। दोपहर करीब 2 बजे पंचकुण्डीय हवन प्रारंभ हुआ। इस दौरान श्रद्धालुओं ने हवन कुण्डों में विधिवत आहुतियां अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और लोककल्याण की कामना की।



हवन के समापन पर माता रानी की आरती की गई और उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। धार्मिक आयोजन के दौरान मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहा।

19 अक्टूबर को महानवमी के विशेष आयोजन

स्वामी सदानंद तीर्थ ने बताया कि महानवमी के अवसर पर मंदिर परिसर में कन्या पूजन, कन्या भोज और भंडारे का आयोजन किया जाएगा। शाम को कलश विसर्जन का कार्यक्रम होगा। उन्होंने श्रद्धालुओं से धार्मिक आयोजनों में शामिल होकर मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने का आह्वान किया।

आस्था के साथ प्राचीन इतिहास भी समेटे हुए है मंदिर

छिंदवाड़ा का यह दुर्गा मंदिर केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। इसका इतिहास स्थानीय मान्यताओं, जनश्रुतियों, प्राचीन प्रतिमाओं और साधना परंपरा से भी जुड़ा हुआ है।

स्वामी शिवोम् तीर्थ कुण्डलिनी महायोग आश्रम दुर्गा मंदिर ट्रस्ट के नाम से प्रसिद्ध यह स्थान लंबे समय से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय में यहां खुले आसमान के नीचे आम के पेड़ के पास शिलाओं के रूप में देवी का स्थान स्थापित था। धीरे-धीरे यहां पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा विकसित हुई।

इस स्थान से पिंडारियों की पूजा-अर्चना, पुराने समय की सैनिक छावनियों और सतपुड़ा छोटी रेल लाइन के शुरुआती दौर से जुड़ी कई जनश्रुतियां भी प्रचलित हैं। हालांकि, इन प्रसंगों को स्थानीय मौखिक परंपराओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

स्वतंत्रता के बाद दोबारा व्यवस्थित हुई पूजा-अर्चना की परंपरा

स्थानीय विवरणों के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद इस धार्मिक स्थल पर नियमित पूजा-अर्चना की व्यवस्था दोबारा शुरू करने की पहल की गई थी।

बताया जाता है कि तत्कालीन कलेक्टर मथुरा प्रसाद द्विवेदी के कार्यकाल में मंदिर परिसर की साफ-सफाई कराकर पूजा-पाठ की परंपरा को पुनः व्यवस्थित किया गया। इसके बाद धीरे-धीरे इस धार्मिक स्थल का विकास आगे बढ़ा।

1960 के दशक में मां दुर्गा की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा

स्थानीय इतिहास के अनुसार, वर्ष 1960 के दशक में यहां मां दुर्गा की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा कराई गई थी। बाद में प्रतिमा खंडित होने पर नई प्रतिमा स्थापित करने की व्यवस्था दुर्गा महिला मंडल के माध्यम से की गई।

स्थानीय विवरणों में उल्लेख है कि तत्कालीन कलेक्टर श्रीमती बनर्जी द्वारा गठित महिला मंडल में प्रत्येक सोमवार और एकादशी को श्रीरामचरितमानस का पाठ किया जाता था। इस दौरान प्राप्त दानराशि का उपयोग धार्मिक कार्यों में किया गया।

इसके बाद स्वामी शिवोम् तीर्थ महाराज के सान्निध्य में मंदिर और आश्रम के विकास को नई दिशा मिली।

बताया जाता है कि तत्कालीन कलेक्टर नर्मदा प्रसाद तिवारी के कार्यकाल में यहां कवेलू की छत वाला मंदिर तथा दीक्षा, साधना और पूजन के लिए पक्का कमरा बनवाया गया। इसी दौर में यह धार्मिक स्थल आश्रम के स्वरूप में विकसित होने लगा।

वर्ष 2013 में रामदरबार और गुरु त्रिमूर्ति की स्थापना

बाद के वर्षों में मंदिर एवं आश्रम परिसर का नवीनीकरण कराया गया। स्थानीय जानकारी के अनुसार, वर्ष 2013 में बसंत पंचमी के अवसर पर रामदरबार की प्राण-प्रतिष्ठा की गई।

इसी अवसर पर स्वामी विष्णु तीर्थ, स्वामी शिवोम् तीर्थ और भास्करानंद तीर्थ महाराज की प्रतिमाएं स्थापित कर गुरु त्रिमूर्ति को प्रतिष्ठित किया गया।

इसके साथ यह स्थान धार्मिक पूजा-अर्चना के अलावा दीक्षा, साधना और गुरु परंपरा के प्रमुख केंद्र के रूप में भी पहचाना जाने लगा।

1200 वर्ष पुरानी बताई जाती है मां सिद्धिदात्री की प्रतिमा

मंदिर की प्रमुख विशेषताओं में मां सिद्धिदात्री की प्राचीन प्रतिमा भी शामिल है। स्थानीय विवरणों के अनुसार, यह प्रतिमा पहले एक लोहार के यहां बाउंड्री वॉल में गड़ी हुई थी।

बाद में इसे प्राचीन प्रतिमा मानते हुए मालखाने में रखवाए जाने की बात कही जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, स्वामी शिवोम् तीर्थ महाराज के सान्निध्य में इस प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा कराई गई।

प्राचीन प्रतिमा से जुड़ा महत्वपूर्ण दावा

स्थानीय जानकारी में वर्ष 2007 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारियों द्वारा प्रतिमा का परीक्षण किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसी आधार पर प्रतिमा को लगभग 1200 वर्ष पुराना बताया जाता है।

हालांकि, प्रतिमा की आयु और परीक्षण से संबंधित आधिकारिक पुरातात्विक रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने के कारण इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकी है।

भरतादेव और गुदड़देव की लोककथा भी है प्रचलित

इस धार्मिक स्थल से भरतादेव और गुदड़देव नामक दो शिल्पकार भाइयों की लोककथा भी जुड़ी हुई है।

लोककथा के अनुसार, दोनों भाई एक गुफा में मूर्तियां बनाया करते थे। उनकी बहन प्रतिदिन भोजन लेकर आती थी और गुफा के बाहर घंटी बजाती थी।

एक दिन वह बिना घंटी बजाए गुफा के भीतर चली गई। इसके बाद दोनों भाइयों के वहां से चले जाने और शिलाओं में परिवर्तित होने की कथा प्रचलित हुई।

स्थानीय लोकमान्यता में इस प्रसंग को भरतादेव और गुदड़देव के नाम से जुड़े स्थान की पहचान से जोड़ा जाता है। यह कथा क्षेत्र की मौखिक सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है।

मंदिर परिसर में विराजमान हैं अनेक देवी-देवता

वर्तमान में मंदिर एवं आश्रम परिसर में मां दुर्गा, मां सिद्धिदात्री, शिवलिंग, भगवान शंकर, गणेश परिवार, लड्डू गोपाल, नागदेव, हनुमान जी, रामदरबार और भैरव जी की प्रतिमाएं स्थापित हैं।

इसके अलावा परिसर में नवग्रह मंदिर, नवग्रह वाटिका और गुरु दरबार में गुरु त्रिमूर्ति भी श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं।

मंदिर का धार्मिक महत्व केवल देवी आराधना तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की साधना, दीक्षा और गुरु परंपरा भी इसे विशेष पहचान प्रदान करती है।

महानवमी पर कन्या पूजन और भंडारे की तैयारी

महाष्टमी पर पंचकुण्डीय हवन संपन्न होने के बाद अब महानवमी के धार्मिक कार्यक्रमों की तैयारी की गई है। स्वामी सदानंद तीर्थ के अनुसार, 19 अक्टूबर को कन्या पूजन एवं कन्या भोज के साथ भंडारे का आयोजन होगा।

शाम को कलश विसर्जन के साथ नवरात्र के विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का समापन किया जाएगा।

आश्रम से जुड़े श्रद्धालुओं के लिए यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय सांस्कृतिक विरासत और गुरु परंपरा से जुड़ने का भी अवसर है।

जय माता दी!

महाष्टमी पर पंचकुण्डीय हवन संपन्न
महानवमी पर कन्या पूजन, भंडारा एवं कलश विसर्जन

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