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स्वीकृति कहीं की, काम कहीं और! नैनपुर की ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों पर उठे गंभीर सवाल

स्वीकृति कहीं की, काम कहीं और! नैनपुर की ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों पर उठे गंभीर सवाल

कागजों में एक गांव और जमीन पर दूसरा ठिकाना होने के आरोप; सरपंच-सचिवों की भूमिका से लेकर तकनीकी सत्यापन तक जांच की मांग

दैनिक रेवाँचल टाईम्स | मंडला। मंडला जिले की जनपद पंचायत नैनपुर अंतर्गत ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों की स्वीकृति और उनके वास्तविक क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि जिस गांव अथवा स्थान के नाम पर विकास कार्य स्वीकृत किए जाते हैं, कुछ मामलों में उनका निर्माण दूसरे स्थान पर कराया जा रहा है।

यदि ये आरोप दस्तावेजी जांच में सही पाए जाते हैं तो मामला केवल निर्माण स्थल बदलने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शासकीय राशि के उपयोग, प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी परीक्षण और भुगतान प्रक्रिया तक कई सवाल खड़े करेगा।

कागजों में एक गांव, जमीन पर दूसरा ठिकाना!

ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए शासन द्वारा स्वीकृत राशि का उपयोग सामान्यतः स्वीकृत कार्य और निर्धारित स्थल के अनुरूप किया जाना अपेक्षित होता है। लेकिन नैनपुर जनपद की कुछ ग्राम पंचायतों को लेकर शिकायतें हैं कि स्वीकृति में दर्ज स्थान और वास्तविक निर्माण स्थल में अंतर हो सकता है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि संबंधित कार्यों की तकनीकी स्वीकृति देने, निरीक्षण करने, मूल्यांकन करने और भुगतान की प्रक्रिया में शामिल जिम्मेदार अधिकारियों ने वास्तविक कार्यस्थल का सत्यापन किया या नहीं?

जांच में इन सवालों के जवाब जरूरी

जिस गांव और स्थान के नाम पर कार्य स्वीकृत हुआ, क्या निर्माण उसी स्थान पर हुआ? यदि स्थान बदला गया तो किस सक्षम अधिकारी की अनुमति से? माप पुस्तिका में कौन-सा स्थल दर्ज है? तकनीकी अधिकारी ने किस स्थान का निरीक्षण किया और भुगतान किस आधार पर किया गया?

सरपंच-सचिव के साथ अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय हो

ग्राम पंचायत के किसी विकास कार्य में केवल सरपंच और सचिव ही नहीं, बल्कि तकनीकी एवं प्रशासनिक स्तर पर भी विभिन्न प्रक्रियाएं जुड़ी होती हैं। इसलिए यदि स्वीकृत स्थान से अलग जगह निर्माण कराने की शिकायत है तो जांच केवल पंचायत स्तर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

संबंधित कार्यों की प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, कार्यादेश, माप पुस्तिका, मूल्यांकन, बिल-वाउचर, भुगतान विवरण और जियो-टैग अथवा उपलब्ध स्थल संबंधी रिकॉर्ड का आपस में मिलान किया जाना चाहिए। इसके साथ ही मौके पर भौतिक सत्यापन होने से स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।

स्वीकृत स्थल बदला तो किसकी अनुमति से?

यदि किसी विकास कार्य की आवश्यकता बाद में दूसरे स्थान पर महसूस हुई तो सवाल यह भी है कि क्या इसके लिए सक्षम स्तर से विधिवत संशोधित स्वीकृति ली गई? यदि ली गई है तो संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए। और यदि बिना आवश्यक प्रक्रिया के स्थल बदल दिया गया तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।

सिर्फ फाइल नहीं, मौके से भी हो मिलान

जांच का सबसे सीधा तरीका है—फाइल में दर्ज स्वीकृत कार्य और स्थान को मौके पर जाकर देखा जाए। इसके बाद माप पुस्तिका, मूल्यांकन और भुगतान रिकॉर्ड से वास्तविक निर्माण का मिलान कराया जाए। इससे आरोपों की सच्चाई भी सामने आएगी और यदि कार्य नियमानुसार हुए हैं तो पंचायतों की स्थिति भी स्पष्ट हो सकेगी।

अधिकारियों की चुप्पी से बढ़ रहे सवाल

मामले में अब संबंधित विभाग और जनपद पंचायत स्तर से स्पष्ट स्थिति सामने आना जरूरी है। शिकायतें यदि गलत हैं तो दस्तावेज और स्थल सत्यापन के आधार पर उनका खंडन किया जाना चाहिए, लेकिन यदि गड़बड़ी सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

आखिर विकास कार्य जनता के पैसे से होते हैं। इसलिए जनता को यह जानने का अधिकार है कि किस काम के लिए कितनी राशि स्वीकृत हुई, काम कहां होना था, वास्तव में कहां हुआ और भुगतान किस आधार पर किया गया।

अब सवाल सीधा है— यदि स्वीकृति एक स्थान की और निर्माण दूसरे स्थान पर हुआ है, तो इसकी अनुमति किसने दी? और यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ है तो संबंधित दस्तावेज सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करने में देरी क्यों?

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