13 सितम्बर विश्व आदिवासी अधिकार दिवस: संरक्षण नहीं, अधिकार और स्वशासन की जरूरत
संयुक्त राष्ट्र की 2007 की घोषणा से पांचवीं अनुसूची, पेसा और वन अधिकार कानून तक—आदिवासी समाज के जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और निर्णय में भागीदारी के अधिकारों का सवाल
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आदिवासी लोगों के अधिकारों की घोषणा स्वीकार किए जाने ने दुनिया भर में आदिवासी समुदायों की गरिमा, संस्कृति, भूमि, संसाधनों और सामूहिक अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में स्थापित किया।
दैनिक रेवांचल टाइम्स। 13 सितंबर का दिन आदिवासी समुदायों के अधिकारों के संघर्ष के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ‘संयुक्त राष्ट्र आदिवासी लोगों के अधिकारों की घोषणा’ को स्वीकार किया था।
13 सितम्बर विश्व आदिवासी अधिकार दिवस: संरक्षण नहीं, अधिकार और स्वशासन की जरूरत
यह घोषणा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आदिवासी समुदायों का प्रश्न केवल गरीबी या पिछड़ेपन तक सीमित नहीं है। यह उनकी पहचान, संस्कृति, स्वशासन, भूमि, प्राकृतिक संसाधनों और निर्णय प्रक्रिया में अधिकारपूर्ण भागीदारी से जुड़ा प्रश्न है।
संविधान में आदिवासी अधिकारों के लिए विशेष व्यवस्था
भारत में आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान ने सामान्य नागरिक अधिकारों से आगे बढ़कर विशेष संवैधानिक और वैधानिक व्यवस्थाएं की हैं। संविधान का अनुच्छेद 244 पांचवीं एवं छठी अनुसूची के प्रशासन का महत्वपूर्ण आधार है।
पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में राज्यपाल को विशेष संवैधानिक जिम्मेदारियां और शक्तियां प्रदान की गई हैं। इनका उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों के हितों की सुरक्षा करना है।
◆ अनुच्छेद 244 और पांचवीं-छठी अनुसूची
◆ अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन की विशेष व्यवस्था
◆ अनुच्छेद 275(1) के तहत विशेष अनुदान
◆ अनुच्छेद 338A के तहत राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
◆ आदिवासी भूमि एवं हितों की सुरक्षा के विशेष प्रावधान
पेसा: ग्राम सभा को स्वशासन की ताकत
संविधान के 73वें संशोधन के बाद अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम स्वशासन को मजबूत बनाने के उद्देश्य से पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996—पेसा लागू किया गया।
पेसा की मूल भावना यह है कि अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा केवल प्रशासनिक औपचारिकता न होकर स्थानीय स्वशासन की केंद्रीय संस्था बने। स्थानीय संसाधनों, योजनाओं, परंपराओं और समुदाय को प्रभावित करने वाले अनेक विषयों में ग्राम सभा को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है।
जल, जंगल और जमीन से आदिवासी समाज का रिश्ता केवल आर्थिक नहीं है। इन्हीं संसाधनों से उसकी आजीविका, सामाजिक व्यवस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान भी जुड़ी हुई है।
वन अधिकार कानून: जंगल पर परंपरागत अधिकारों की मान्यता
अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के माध्यम से व्यक्तिगत तथा सामुदायिक वन अधिकारों को कानूनी मान्यता देने की व्यवस्था की गई।
कानून सामुदायिक वन संसाधनों से जुड़े अधिकारों और उनके संरक्षण-प्रबंधन में ग्राम सभा की भूमिका को महत्वपूर्ण स्थान देता है। इसके पीछे यह स्वीकार्यता भी है कि जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में स्थानीय आदिवासी समुदायों की ऐतिहासिक भूमिका रही है।
बल्कि अपने भविष्य का निर्णयकर्ता माना जाना चाहिए।”
10.45 करोड़ अनुसूचित जनजाति आबादी, फिर भी विकास की चुनौती
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जनजातियों की आबादी लगभग 10.45 करोड़ थी, जो देश की कुल आबादी का करीब 8.6 प्रतिशत थी।
आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विकास का प्रश्न केवल आय से संबंधित नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, पेयजल, स्वच्छता, रोजगार और बुनियादी सेवाओं तक पहुंच भी इसके महत्वपूर्ण आयाम हैं।
ST आबादी (2011)
कुल आबादी में हिस्सा
ST साक्षरता दर (2011)
विस्थापन केवल जमीन का नहीं, संस्कृति का भी सवाल
आदिवासी समाज की अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक रूप से जंगल, जमीन, जलस्रोत और सामुदायिक प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी रही है। खेती, पशुपालन, मछली पालन, लघु वनोपज, हस्तशिल्प और जंगल आधारित आजीविका आर्थिक जीवन के महत्वपूर्ण आधार हैं।
ऐसे में खनन, बड़े बांध, औद्योगिक परियोजनाओं, वन भूमि के हस्तांतरण अथवा दूसरी बड़ी परियोजनाओं का असर केवल जमीन के एक टुकड़े पर नहीं पड़ता। इससे आजीविका के साथ सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक पहचान भी प्रभावित हो सकती है।
आदिवासी संस्कृति जंगल, पहाड़, नदी, देवस्थल, बोली, लोकगीत, नृत्य, बीज, कृषि पद्धतियों और सामुदायिक परंपराओं से निर्मित होती है। इसलिए विस्थापन कई परिस्थितियों में आर्थिक के साथ सांस्कृतिक विस्थापन का रूप भी ले सकता है।
कानून मौजूद, असली चुनौती प्रभावी क्रियान्वयन की
भारत में आदिवासी अधिकारों की संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था व्यापक है। पांचवीं अनुसूची, पेसा, वन अधिकार अधिनियम और भूमि अधिग्रहण से संबंधित विशेष प्रावधान ग्राम सभा, सामुदायिक संसाधनों तथा आदिवासी हितों को महत्वपूर्ण कानूनी आधार देते हैं।
लेकिन सबसे बड़ी चुनौती इन अधिकारों को कागज से जमीन तक प्रभावी रूप से लागू करने की है। कई बार यहीं संवैधानिक वादे और विकास की वास्तविक प्रक्रिया के बीच अंतर दिखाई देता है।
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ
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