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पूना पैक्ट के 94 साल: पृथक निर्वाचन से आरक्षित सीटों तक, कैसे बदली दलित राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दिशा

दैनिक रेवांचल टाईम्स | विशेष आलेख

पूना पैक्ट के 94 साल: पृथक निर्वाचन से आरक्षित सीटों तक, कैसे बदली दलित राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दिशा

24 सितंबर 1932 का ऐतिहासिक समझौता आज भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की बहस को समझने का महत्वपूर्ण दस्तावेज

विशेष आलेख। भारतीय सामाजिक और संवैधानिक इतिहास में 24 सितंबर 1932 की तारीख विशेष महत्व रखती है। इसी दिन पूना में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल पर वह ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है।



यह घटनाक्रम केवल डॉ. भीमराव आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच मतभेद और समझौते तक सीमित नहीं था। इसके केंद्र में तत्कालीन ‘Depressed Classes’ के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, पृथक निर्वाचन, आरक्षित सीटों और संवैधानिक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न थे।

गोलमेज सम्मेलनों से बनी पृष्ठभूमि

1930 से 1932 के बीच हुए गोलमेज सम्मेलनों के दौरान डॉ. आंबेडकर ने वंचित समुदायों के स्वतंत्र और प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न प्रमुखता से उठाया। उनका तर्क था कि सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को राजनीतिक सुरक्षा और प्रतिनिधित्व की ठोस व्यवस्था की आवश्यकता है।

दूसरे गोलमेज सम्मेलन के दौरान डॉ. आंबेडकर और गांधी के बीच पृथक निर्वाचन को लेकर मतभेद सामने आए। आंबेडकर स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व को वंचित समुदायों की राजनीतिक शक्ति से जोड़कर देखते थे, जबकि गांधी पृथक निर्वाचन का विरोध करते थे।

17 अगस्त 1932 को आया कम्युनल अवार्ड

ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने 17 अगस्त 1932 को कम्युनल अवार्ड की घोषणा की। इसमें तत्कालीन ‘Depressed Classes’ के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई थी।

इस व्यवस्था का अर्थ था कि इस वर्ग के मतदाताओं को अपने समुदाय के प्रतिनिधि चुनने में पृथक राजनीतिक भूमिका मिलती। गांधी ने इस व्यवस्था का विरोध किया।

20 सितंबर को गांधी ने शुरू किया अनशन

कम्युनल अवार्ड में पृथक निर्वाचन के प्रावधान के विरोध में गांधी ने 20 सितंबर 1932 को यरवडा जेल में आमरण अनशन शुरू किया। इसके बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर समझौते के प्रयास तेज हुए।

24 सितंबर 1932: हुआ ऐतिहासिक पूना पैक्ट

बातचीत के बाद 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट अस्तित्व में आया। समझौते का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि पृथक निर्वाचन की व्यवस्था के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन और आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की गई।

148
प्रांतीय आरक्षित सीटें
18%
केंद्रीय विधानमंडल में प्रावधान
9
प्रमुख प्रावधान

प्रांतीय विधानसभाओं में 148 सीटें

समझौते में तत्कालीन ‘Depressed Classes’ के लिए प्रांतीय विधानसभाओं में कुल 148 आरक्षित सीटों का प्रावधान किया गया। मद्रास में 30, बॉम्बे एवं सिंध में 25, पंजाब में 8, बिहार एवं उड़ीसा में 18, मध्य प्रांत में 20, असम में 7, बंगाल में 30 और संयुक्त प्रांत में 20 सीटें निर्धारित की गईं।

पूना पैक्ट के प्रमुख बिंदु

● संयुक्त निर्वाचन: पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन और आरक्षित सीटों की व्यवस्था।

● प्राथमिक चुनाव: संबंधित वर्ग के मतदाताओं द्वारा पहले उम्मीदवारों का पैनल चुनने की प्रक्रिया।

● केंद्रीय प्रतिनिधित्व: केंद्रीय विधानमंडल में भी आरक्षित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था।

● 18 प्रतिशत: ब्रिटिश भारत के केंद्रीय विधानमंडल में सामान्य निर्वाचन के लिए निर्धारित सीटों में से 18 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान।

● सरकारी सेवाएं: समुदाय के आधार पर स्थानीय निकायों और सरकारी सेवाओं में अयोग्यता नहीं तथा उचित प्रतिनिधित्व के प्रयास की बात।

● शिक्षा: प्रांतीय शैक्षणिक अनुदान में से शैक्षणिक सुविधाओं के लिए पर्याप्त राशि अलग रखने का प्रावधान।

26 सितंबर को गांधी ने समाप्त किया अनशन

पूना पैक्ट पर सहमति बनने के बाद 26 सितंबर 1932 को गांधी ने अपना अनशन समाप्त किया। इस प्रकार कम्युनल अवार्ड के बाद पैदा हुआ राजनीतिक संकट एक नए संवैधानिक समझौते तक पहुंचा।

समझौते को सिर्फ ‘जीत’ या ‘हार’ में देखना क्यों अधूरा?

पूना पैक्ट का ऐतिहासिक मूल्यांकन जटिल रहा है। एक ओर पृथक निर्वाचन समाप्त हुआ, जिसे डॉ. आंबेडकर वंचित समुदाय की स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के लिए महत्वपूर्ण मानते थे। दूसरी ओर संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ी तथा शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े प्रावधान भी समझौते में शामिल हुए।

यही कारण है कि पूना पैक्ट का अध्ययन केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रहता। इसके केंद्र में यह प्रश्न भी है कि सामाजिक रूप से वंचित समुदाय का वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधि किस प्रकार चुना जाए और उसके चयन में उस समुदाय के मतदाताओं की भूमिका कितनी प्रभावी हो।

आज भी प्रासंगिक हैं तीन बड़े सवाल

राजनीतिक प्रतिनिधित्व: वंचित समुदायों की आवाज लोकतांत्रिक संस्थाओं में प्रभावी रूप से कैसे पहुंचे?

सामाजिक न्याय: ऐतिहासिक वंचना को दूर करने में विशेष संवैधानिक उपायों की भूमिका क्या हो?

प्रतिनिधित्व की स्वतंत्रता: आरक्षित सीट और वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच क्या संबंध है?

इतिहास को मूल दस्तावेजों के साथ पढ़ने की जरूरत

पूना पैक्ट भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें डॉ. आंबेडकर की राजनीतिक प्रतिनिधित्व संबंधी चिंताएं, गांधी का पृथक निर्वाचन के प्रति विरोध, ब्रिटिश संवैधानिक सुधार और वंचित समुदायों के राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न एक साथ दिखाई देता है।

इसलिए इस ऐतिहासिक समझौते को किसी एक पक्ष की जीत या हार के रूप में देखने के बजाय मूल दस्तावेजों, डॉ. आंबेडकर के लेखन और उस समय की संवैधानिक बहसों के साथ समझना अधिक उपयोगी है।

आलेख: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
अध्यक्ष: गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर
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