परिवर्तिनी एकादशी व्रत से मिलता है पुण्य फल, पढ़ें राजा मांधाता से जुड़ी पौराणिक कथा
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पद्मा एकादशी पर भगवान हृषीकेश की पूजा का वर्णन
पं. मुकेश जोशी। एकादशी व्रत कथा के अनुसार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में कौन-सी एकादशी आती है। भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी पद्मा एकादशी के नाम से जानी जाती है, जिसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान हृषीकेश की पूजा का विधान बताया गया है।
राजा मांधाता की कथा
कथा के अनुसार राजा मांधाता अत्यंत प्रतापी, सत्यवादी और धर्म का पालन करने वाले राजा थे। वे अपनी प्रजा का पालन संतान के समान करते थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी और लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते थे।
एक समय उनके राज्य में लगातार तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। वर्षा के अभाव में अन्न का संकट उत्पन्न होने लगा और प्रजा परेशान हो गई। तब प्रजा राजा के पास पहुंची और वर्षा न होने से उत्पन्न संकट का समाधान करने की प्रार्थना की।
प्रजा की परेशानी देखकर राजा मांधाता ने संकट का कारण जानने और उसके समाधान के लिए ऋषि-मुनियों की शरण लेने का निश्चय किया।
ऋषि से मांगा संकट दूर करने का उपाय
राजा वन की ओर गए, जहां उन्हें ऋषि के दर्शन हुए। राजा ने प्रणाम कर अपने राज्य में वर्षा न होने की समस्या बताई और इसका उपाय पूछा। कथा के अनुसार ऋषि ने राजा को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पद्मा अर्थात परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।
राजा ने किसी निरपराध व्यक्ति को कष्ट पहुंचाने के स्थान पर धार्मिक उपाय अपनाने की इच्छा व्यक्त की। तब ऋषि ने कहा कि राजा अपनी प्रजा और परिजनों के साथ एकादशी का व्रत करें।
राजा ने प्रजा के साथ किया एकादशी व्रत
ऋषि की बात सुनकर राजा मांधाता अपने राज्य लौट आए और प्रजा के साथ भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत किया। कथा में वर्णन है कि व्रत के प्रभाव से मेघ बरसे, पृथ्वी जल से भर गई और राज्य में पुनः सुख-समृद्धि लौट आई।
प्रस्तुत व्रत कथा में परिवर्तिनी एकादशी के दिन जल से भरा घड़ा, दही और चावल दान करने का उल्लेख मिलता है। इसके साथ छाता और जूते दान करने का भी वर्णन किया गया है। कथा के अनुसार श्रद्धापूर्वक व्रत कथा का पाठ और श्रवण पुण्यदायी माना गया है।
