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अमानक प्लास्टिक पॉलीथिन का धड़ल्ले से उपयोग शहर से गांव तक खुलेआम चल रहा कारोबार, खाद्य सामग्री के साथ पॉलीथिन निगल रहे मवेशी, पर्यावरण पर भी मंडरा रह संकट

रेवांचल टाइम्स | मंडला

अमानक पॉलीथिन का धड़ल्ले से उपयोग: शहर से गांव तक फैला कारोबार, जिम्मेदारों की निगरानी पर सवाल

खाद्य सामग्री के साथ प्लास्टिक निगल रहे मवेशी, नालियों में पहुंचकर जल निकासी में बन रही बाधा; बाजारों में नियमित जांच और प्रभावी कार्रवाई की उठी मांग

रेवांचल टाइम्स | मंडला। पर्यावरण संरक्षण और प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर लगातार जागरूकता अभियानों के बावजूद मंडला शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक अमानक प्लास्टिक पॉलीथिन का उपयोग खुलेआम होता दिखाई दे रहा है। बाजारों में सामान देने के लिए प्लास्टिक की थैलियों का इस्तेमाल जारी है, वहीं उपयोग के बाद बड़ी संख्या में पॉलीथिन सड़कों, नालियों, खाली प्लॉटों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर पहुंच रही है।

file photo

सब्जी, फल, किराना और खाद्य सामग्री से लेकर रोजमर्रा के छोटे-बड़े सामान तक पॉलीथिन में दिए जा रहे हैं। उपयोग के बाद इन्हें सामान्य कचरे के साथ खुले में फेंक देने की प्रवृत्ति समस्या को और गंभीर बना रही है।

मवेशियों के लिए खतरा बन रही फेंकी गई पॉलीथिन खुले कचरे में भोजन तलाशने वाले मवेशियों के लिए पॉलीथिन गंभीर खतरा बन सकती है। खाद्य अवशेषों के साथ प्लास्टिक निगलने से पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का खतरा रहता है।

खाद्य सामग्री के साथ पॉलीथिन निगल रहे मवेशी

शहर के कई हिस्सों में खुले में पड़े कचरे के आसपास मवेशियों का जमावड़ा देखा जा सकता है। कचरे में बची खाद्य सामग्री खाने के दौरान पशुओं के पॉलीथिन और अन्य प्लास्टिक कचरा निगल लेने का खतरा बना रहता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि जब सार्वजनिक स्थानों पर प्लास्टिक कचरा लगातार दिखाई दे रहा है तो कचरा प्रबंधन और बाजारों में अमानक प्लास्टिक की निगरानी की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

नालियों से खाली जमीन तक पहुंच रही पॉलीथिन

पॉलीथिन का असर शहर की सफाई और जल निकासी व्यवस्था पर भी दिखाई देता है। उपयोग के बाद फेंकी गई प्लास्टिक थैलियां नालियों में पहुंचकर पानी के प्रवाह में बाधा पैदा कर सकती हैं। बारिश के दौरान कचरे से नालियां अवरुद्ध होने पर जलभराव की समस्या और बढ़ सकती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्थिति चिंताजनक है। गांवों की दुकानों और हाट-बाजारों में पॉलीथिन का उपयोग आम दिखाई देता है। उपयोग के बाद प्लास्टिक कचरा सड़क किनारे, खेतों की मेड़, नालों और खाली स्थानों पर फेंक दिया जाता है।

सुविधा कुछ मिनटों की, संकट लंबे समय का
खुले में फेंका गया प्लास्टिक कचरा लंबे समय तक पर्यावरण में बना रह सकता है। इसलिए पॉलीथिन के इस्तेमाल में कमी के साथ उसके सही संग्रह और निस्तारण पर भी ध्यान देना जरूरी है।

कार्रवाई कागजों तक सीमित होने के आरोप

स्थानीय लोगों का कहना है कि प्लास्टिक के उपयोग को नियंत्रित करने और पर्यावरण संरक्षण के लिए समय-समय पर अभियान तो चलाए जाते हैं, लेकिन धरातल पर अमानक पॉलीथिन का उपयोग बंद होता दिखाई नहीं दे रहा। लोगों का मानना है कि बाजारों में नियमित जांच और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कार्रवाई से इसके उपयोग पर अंकुश लगाया जा सकता है।

केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं होंगे। अमानक प्लास्टिक की बिक्री, उसके व्यावसायिक उपयोग और सार्वजनिक स्थानों पर प्लास्टिक कचरा फेंकने जैसी गतिविधियों पर लागू नियमों के अनुसार जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है।

जिम्मेदार विभागों पर उठ रहे सवाल

शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक अमानक पॉलीथिन की उपलब्धता कई सवाल खड़े कर रही है। यदि नियमों के दायरे में प्रतिबंधित अथवा अमानक प्लास्टिक बाजार तक पहुंच रहा है, तो उसके उत्पादन, आपूर्ति और बिक्री के स्रोतों पर निगरानी तथा कार्रवाई कितनी प्रभावी है, यह भी जांच का विषय है।

सवाल—पॉलीथिन बाजार तक पहुंच कैसे रही? यदि अमानक पॉलीथिन दुकानों और बाजारों में आसानी से उपलब्ध है तो केवल छोटे दुकानदारों तक कार्रवाई सीमित रखने के बजाय इसकी आपूर्ति श्रृंखला और स्रोतों तक पहुंचना भी जरूरी है।

संयुक्त अभियान और नियमित जांच की जरूरत

जरूरत इस बात की है कि प्रशासन और संबंधित विभाग संयुक्त रूप से बाजारों में जांच अभियान चलाएं। नियमों के विरुद्ध पाए जाने वाले अमानक प्लास्टिक को जब्त करने के साथ जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

इसके साथ ही आम नागरिकों और व्यापारियों को कपड़े, जूट तथा अन्य पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों के उपयोग के लिए प्रोत्साहित करना भी जरूरी है। प्लास्टिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई और जनभागीदारी दोनों की आवश्यकता है।

आज की लापरवाही, कल का पर्यावरण संकट कुछ मिनट की सुविधा के लिए इस्तेमाल की गई पॉलीथिन लंबे समय तक मिट्टी, जल निकासी व्यवस्था और आसपास के पर्यावरण पर बोझ बनी रह सकती है।

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