बीज की दुकान में रेत-सीमेंट, पंचायत में भुगतान का खेल!
मंडला। किसानों को बीज, खाद और कृषि सामग्री उपलब्ध कराने वाले प्रतिष्ठानों की निगरानी के लिए जिले में विभागीय व्यवस्था मौजूद है। इसके बावजूद आदित्य फर्टिलाइजर को लेकर सामने आए आरोप इस निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं। आरोप है कि कृषि सामग्री के कारोबार से जुड़े प्रतिष्ठान पर रेत और सीमेंट जैसी निर्माण सामग्री का कारोबार भी किया जा रहा है।
कृषि अधिकारी की निगरानी या सिर्फ कागजों की खानापूर्ति?
कृषि सामग्री बेचने वाले प्रतिष्ठानों की जांच और निगरानी संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है। ऐसे में यदि एक ही प्रतिष्ठान से कृषि सामग्री के साथ निर्माण सामग्री का कारोबार किए जाने का आरोप सामने आता है तो संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
- क्या प्रतिष्ठान का कभी भौतिक निरीक्षण किया गया?
- क्या उसके लाइसेंस और पंजीयन की जांच हुई?
- क्या बेची जा रही सामग्री का रिकॉर्ड देखा गया?
- यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है तो विभाग स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करता?
बनेहरी पंचायत के भुगतान ने बढ़ाए सवाल
मामला केवल दुकान तक सीमित नहीं है। ग्राम पंचायत बनेहरी में कुछ बिलों और उनके आधार पर किए गए कथित भुगतानों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। अब इन बिलों और संबंधित कार्यों का दस्तावेजी तथा भौतिक सत्यापन किए जाने की मांग सामने आई है।
जिस कार्य के लिए भुगतान हुआ, वह वास्तव में कराया गया या नहीं? खरीदी गई सामग्री कहां इस्तेमाल हुई? बिल किसने प्रस्तुत किया, सत्यापन किसने किया और भुगतान किस आधार पर स्वीकृत हुआ? इन सवालों का जवाब मौके की जांच और दस्तावेजों के मिलान से ही मिल सकता है।
कागजों में विकास या जमीन पर भी हुआ काम?
यदि भुगतान से जुड़े सभी कार्य वास्तव में धरातल पर हुए हैं तो जांच में स्थिति स्वतः स्पष्ट हो जाएगी। लेकिन यदि किसी कार्य को कागजों में दिखाकर भुगतान किए जाने का आरोप सही पाया जाता है तो मामला सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग से जुड़ सकता है। इसलिए केवल फाइलों की जांच पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।
- बिल और वाउचर
- कार्य स्वीकृति और भुगतान आदेश
- सामग्री खरीदी का रिकॉर्ड
- आपूर्तिकर्ता से जुड़े दस्तावेज
- बैंक के माध्यम से किए गए भुगतान
- संबंधित कार्य का मौके पर भौतिक सत्यापन
सिस्टम पर सवाल—गड़बड़ी की भनक विभाग से पहले जनता को क्यों?
किसानों से जुड़े कारोबार की निगरानी के लिए कृषि विभाग है और पंचायत के सरकारी धन पर निगरानी के लिए अलग प्रशासनिक तंत्र। इसके बावजूद आरोप सामने आने के बाद ही जांच की बात उठना व्यवस्था की सक्रियता पर सवाल पैदा करता है।
कृषि विभाग और सिस्टम का नया गणित!
खेती का सीधा गणित है—बीज डालो और फसल काटो। लेकिन आरोपों के बीच सरकारी सिस्टम पर तंज कुछ यूं है— “बिल का बीज डालो, भुगतान की फसल काटो और जांच की बारिश आने से पहले फाइल सुखा लो!”
कहीं खाद-बीज की दुकान में रेत-सीमेंट के कारोबार का आरोप हो तो सवाल उठता है कि संबंधित विभाग को इसकी जानकारी थी या नहीं। पंचायत के भुगतान पर सवाल उठें तो जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा। जनता का सवाल सीधा है—जब जिम्मेदार अधिकारी मौजूद हैं तो कथित अनियमितताओं की जानकारी विभाग से पहले आम लोगों तक क्यों पहुंचती है?
निष्पक्ष जांच से ही साफ होगी पूरी तस्वीर
पूरे मामले में जिला प्रशासन, जनपद पंचायत और संबंधित विभागों से अपेक्षा है कि आदित्य फर्टिलाइजर के लाइसेंस-पंजीयन, कारोबार की प्रकृति और रेत-सीमेंट की कथित बिक्री से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर स्थिति स्पष्ट करें।
इसके साथ ही ग्राम पंचायत बनेहरी में सवालों के घेरे में आए भुगतानों की दस्तावेजी जांच के साथ मौके पर भौतिक सत्यापन कराया जाना जरूरी है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका तय कर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोप निराधार निकलते हैं तो जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
मुख्य कार्यपालन अधिकारी
जिला पंचायत मंडला

