योग्यता के बिना ‘उच्च कुशल’ का वेतनमान? भुआ-बिछिया नगर परिषद में कर्मचारी के वेतन निर्धारण पर उठे सवाल
दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी मनोज निगम की पात्रता और वेतन निर्धारण को लेकर सवाल; CMO स्तर के कथित अनुमोदन पर भी निगाहें—जिला प्रशासन से रिकॉर्ड आधारित जांच की मांग
दैनिक रेवांचल टाइम्स — मंडला। जिले की नगर परिषद भुआ-बिछिया की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला निर्माण कार्य अथवा किसी ठेके के भुगतान का नहीं, बल्कि एक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी की पात्रता और वेतन निर्धारण से जुड़ा बताया जा रहा है।
सूत्रों से सामने आई जानकारी के अनुसार नगर परिषद में पदस्थ दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी मनोज निगम को निर्धारित योग्यता के संबंध में सवाल उठने के बावजूद कथित रूप से ‘उच्च कुशल श्रमिक’ श्रेणी का वेतनमान दिए जाने की बात सामने आई है।
CMO के कथित अनुमोदन पर भी निगाहें
मामले में यह भी बताया जा रहा है कि संबंधित वेतन निर्धारण को मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) के स्तर से अनुमोदन मिला। यदि अभिलेखों से इसकी पुष्टि होती है, तो मामला केवल कर्मचारी की योग्यता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पात्रता परीक्षण से लेकर प्रस्ताव और अनुमोदन तक की पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की जांच आवश्यक हो सकती है।
नियमों की कसौटी पर कौन करेगा जांच?
ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वेतन निर्धारण के समय कर्मचारी की शैक्षणिक एवं तकनीकी योग्यता, नियुक्ति की प्रकृति, वास्तविक कार्य, अनुभव और उस समय लागू शासन नियमों का किस प्रकार परीक्षण किया गया।
- मनोज निगम की शैक्षणिक एवं तकनीकी योग्यता क्या है?
- उच्च कुशल श्रमिक श्रेणी के लिए उस समय लागू पात्रता क्या थी?
- वेतन निर्धारण से पहले किस अधिकारी ने दस्तावेजों का परीक्षण किया?
- किस नियम अथवा आदेश के आधार पर वेतनमान स्वीकृत किया गया?
- CMO स्तर पर अनुमोदन हुआ तो उसके आधार में कौन-कौन से दस्तावेज थे?
फाइल खुले तो सामने आ सकता है पूरा सच
इस मामले की वास्तविक स्थिति बयानबाजी से अधिक नगर परिषद की मूल फाइल और आधिकारिक अभिलेखों से स्पष्ट हो सकती है। नियुक्ति आदेश, शैक्षणिक एवं तकनीकी योग्यता संबंधी प्रमाणपत्र, कार्य आवंटन, वेतन निर्धारण प्रस्ताव, नोटशीट, अनुमोदन आदेश तथा भुगतान संबंधी रिकॉर्ड की जांच से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी या नहीं।
यदि दस्तावेज साबित करते हैं कि कर्मचारी निर्धारित पात्रता पूरी करता था और नियमानुसार उसे उच्च कुशल श्रमिक श्रेणी का वेतनमान दिया गया, तो उठ रहे सवालों का जवाब स्वतः मिल जाएगा।
लेकिन यदि सक्षम जांच में पात्रता अथवा प्रक्रिया में किसी तरह की अनियमितता सामने आती है, तो यह भी जांच का विषय होगा कि निर्णय किस स्तर पर लिया गया और उससे शासकीय राशि पर कितना वित्तीय प्रभाव पड़ा।
नियुक्ति आदेश • योग्यता प्रमाणपत्र • तकनीकी योग्यता • कार्य आवंटन • वेतन निर्धारण प्रस्ताव • नोटशीट/अनुमोदन • भुगतान अभिलेख
जिला प्रशासन से जांच की अपेक्षा, निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल
अब सवाल जिला प्रशासन की भूमिका को लेकर भी उठ रहा है। नगर परिषदों में कर्मचारियों की पात्रता और वेतन निर्धारण जैसे मामलों का सीधा संबंध सार्वजनिक धन से होता है। ऐसे में इस मामले की रिकॉर्ड आधारित निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक किए जाने की अपेक्षा की जा रही है।
सवाल यह भी है कि यदि इस संबंध में शिकायत अथवा विश्वसनीय जानकारी प्रशासन के संज्ञान में आती है तो संबंधित फाइल का परीक्षण कब कराया जाएगा और यदि कोई अनियमितता मिलती है तो जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की जाएगी।
पात्रता सही है तो रिकॉर्ड सामने आए, गलत है तो जिम्मेदारी तय हो
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक दस्तावेजों की जांच आवश्यक है। यदि संबंधित कर्मचारी पूरी तरह पात्र है तो नगर परिषद को नियम और रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वहीं यदि जांच में नियमों से अलग लाभ दिए जाने की पुष्टि होती है तो सक्षम प्राधिकारी को नियमानुसार जिम्मेदारी और वित्तीय प्रभाव का परीक्षण करना चाहिए।
मनोज निगम को उच्च कुशल श्रमिक का वेतनमान किस नियम के तहत दिया गया? उनकी निर्धारित योग्यता क्या है? पात्रता का परीक्षण किसने किया? अनुमोदन किस दस्तावेज के आधार पर हुआ? और क्या जिला प्रशासन पूरी फाइल की जांच कराएगा?
अब गेंद जिला प्रशासन के पाले में
फिलहाल मामला सूत्रों से प्राप्त जानकारी और उससे उठे सवालों पर आधारित है। आरोपों की अंतिम पुष्टि संबंधित अभिलेखों और सक्षम प्रशासनिक जांच से ही हो सकती है। ऐसे में अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं कि वह मामले से संबंधित रिकॉर्ड का परीक्षण कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट कराता है या सवाल फाइलों के बीच ही उलझे रहते हैं।
