सांप ने डसा तो अस्पताल की बजाय चलता रहा झाड़-फूंक का सिलसिला, हालत बिगड़ी तो मंडला-जबलपुर रेफर… घर लौटते ही मौत
नैनपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल—गांवों में तैनात मैदानी अमला आखिर कर क्या रहा है? जिम्मेदारों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
दैनिक रेवाँचल टाईम्स - मंडला, आदिवासी बहुल्य जिले में आज भी विकास और जागरूकता कोसों दूर नज़र आ रहा हैं जहाँ लोग पहले सरकारी व्यवस्था में भरोसा न करते हुए झाड़ फुक को सही मानते हैं और इस के चलते अनेकों लोग असमय काल के गाल में समा गए
वही सूत्रो से प्राप्त जानकारी के अनुसार नैनपुर में जहाँ सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा खड़ा करने का दावा करती है, गांव-गांव आशा कार्यकर्ता, एएनएम, सुपरवाइजर और सीएचओ की तैनाती है, अस्पतालों में एंटी-स्नेक वेनम जैसी जीवनरक्षक सुविधा उपलब्ध है—लेकिन जब ग्रामीण इलाकों में किसी व्यक्ति को सांप डसता है तो वह अस्पताल पहुंचने से पहले झाड़-फूंक के फेर में अपनी जिंदगी गंवा देता है।
नैनपुर थाना क्षेत्र के ग्राम पंचायत ईश्वरपुर निवासी तेजलाल पिता मंटू भावरे (30 वर्ष) की मौत ने स्वास्थ्य विभाग की मैदानी व्यवस्था और जनजागरूकता दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह भी है कि सरकार की तमाम स्वास्थ्य एडवायजरी आखिर गांव के उस घर तक क्यों नहीं पहुंच पा रही, जहां आज भी सांप के काटने पर अस्पताल से पहले झाड़-फूंक को प्राथमिकता दी जा रही है?
27 अगस्त को सांप ने डसा, झाड़-फूंक में निकल गया कीमती समय
जानकारी के अनुसार 27 अगस्त को तेजलाल के बाएं पैर के पंजे में सांप ने डस लिया। इसके बाद परिजन उसे तत्काल अस्पताल ले जाने की बजाय गांव में ही झाड़-फूंक करवाते रहे। जब उसकी हालत बिगड़ने लगी, तब उसे चिरईडोंगरी अस्पताल ले जाया गया।
वहां ड्यूटी डॉक्टर ने गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे मंडला रेफर किया। मंडला अस्पताल से भी हालत गंभीर होने पर जबलपुर रेफर किया गया। लेकिन यहां भी इलाज की जद्दोजहद के बीच परिजन उसे 30 अगस्त की शाम वापस घर ले आए। देर रात उसकी मौत हो गई।
अगली सुबह शव को नैनपुर अस्पताल लाया गया। मेमो के आधार पर नैनपुर पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराया और बाद में शव परिजनों को सौंप दिया।
सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं, पूरी व्यवस्था का है
तेजलाल की मौत को महज एक सांप के डसने से हुई मौत कहकर मामला खत्म कर देना आसान है। लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है।
गांव में स्वास्थ्य विभाग का मैदानी अमला आखिर कहां है?
आशा कार्यकर्ता, एएनएम, सुपरवाइजर और सीएचओ जैसे स्वास्थ्यकर्मियों की जिम्मेदारी केवल कागजों और रिकॉर्ड तक सीमित है या ग्रामीणों को समय पर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देना भी उनके दायित्व में शामिल है?
वही अगर ग्रामीणों को यह जानकारी नहीं है कि सांप के काटने के बाद झाड़-फूंक नहीं, बल्कि तत्काल अस्पताल पहुंचना जीवन बचाने का सबसे जरूरी कदम है, तो फिर वर्षों से चल रहे जनजागरूकता अभियानों का असर कहां दिखाई दे रहा है?
डेली अप-डाउन की चर्चा, गांव में मौजूदगी पर सवाल
ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात स्वास्थ्यकर्मियों को लेकर अक्सर डेली अप-डाउन और वास्तविक मैदानी मौजूदगी को लेकर सवाल उठते रहे हैं। यदि स्वास्थ्य विभाग का मैदानी नेटवर्क वास्तव में सक्रिय है तो ऐसी घटनाओं में ग्रामीण परिवारों तक समय पर सही सलाह क्यों नहीं पहुंचती?
यह किसी एक कर्मचारी पर आरोप लगाने का मामला नहीं है, बल्कि पूरी मैदानी स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही तय करने का विषय है।
स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को यह बताना चाहिए कि ईश्वरपुर क्षेत्र में ग्रामीणों को सांप काटने की स्थिति में तत्काल अस्पताल पहुंचने और झाड़-फूंक से बचने के लिए कितनी नियमित जागरूकता दी गई? संबंधित मैदानी अमला गांवों में कितना सक्रिय है? और जनप्रतिनिधियों ने ऐसी स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं को लेकर क्या पहल की?
सरकार वेतन दे रही है, बदले में जवाबदेही भी चाहिए
सरकारी कर्मचारियों को हर माह वेतन और सुविधाएं मिलती हैं। सरकार योजनाएं बनाती है, अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र संचालित करती है, लेकिन यदि अंतिम छोर पर बैठा ग्रामीण आज भी अंधविश्वास के कारण अपनी जान गंवा रहा है तो व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों को आईना देखने की जरूरत है।
यह भी जांच का विषय है कि तेजलाल को समय पर चिकित्सा सुविधा और सही सलाह क्यों नहीं मिल सकी और परिजन अस्पताल पहुंचने में इतना विलंब क्यों कर बैठे।
मासूम बच्चों और बूढ़े माता-पिता के सामने अब कौन खड़ा होगा?
एक परिवार का जवान सहारा चला गया। पीछे मासूम बच्चे, पत्नी और बूढ़े माता-पिता रह गए हैं। उनकी आंखों में अब सिर्फ एक सवाल है—जिस व्यक्ति के सहारे परिवार का भविष्य टिका था, उसके जाने के बाद जिंदगी कैसे चलेगी?
सरकार यदि राहत राशि दे भी दे तो क्या उससे उस परिवार का दर्द लौटाया जा सकता है?
राहत राशि मरहम हो सकती है, लेकिन मौत का मर्म नहीं मिटा सकती।
अब जिम्मेदारों से सवाल जरूरी है—
क्या गांवों में स्वास्थ्य विभाग की मौजूदगी सिर्फ कागजों पर है?
क्या जनजागरूकता अभियान केवल रिपोर्टों और बैठकों तक सीमित हैं?
क्या जनप्रतिनिधि और स्वास्थ्य विभाग इस मौत की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेंगे? और क्या अगली मौत का इंतजार करने के बाद व्यवस्था जागेगी?
तेजलाल की मौत सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है। अब जरूरत संवेदना जताने की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने की
