जिम्मेदारों की संवेदनहीनता ने बच्चों का भविष्य किया दांव पर
तीन वर्षों से जर्जर भवन के कारण निजी झोपड़ी में संचालित हो रहा प्राथमिक विद्यालय*
विकास और शिक्षा के दावों पर उठे गंभीर सवाल
दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला।घुघरी विकासखंड की ग्राम पंचायत सिंघनपुरी के खेरमाई मोहल्ला में शिक्षा व्यवस्था की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो विकास और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के तमाम सरकारी दावों की पोल खोल देती है। यहां प्राथमिक विद्यालय का भवन जर्जर होने के कारण पिछले लगभग तीन वर्षों से स्कूल का संचालन एक निजी झोपड़ी में किया जा रहा है। स्थिति इतनी गंभीर और भयावह है कि कक्षा पहली से पांचवीं तक के सभी विद्यार्थियों की पढ़ाई एक ही छोटे से कमरे में कराई जा रही है।
बरसात के मौसम में टपकती झोपड़ी, बच्चों के लिए सीमित जगह और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बीच मासूम बच्चे पढ़ने को मजबूर हैं। या यूं कहिए कि पढ़ने को कम और अपने बिगड़ते भविष्य को लेकर मजबूर हैं। क्योंकि ऐसे माहौल में न तो शिक्षण सुचारु रूप से हो सकता है और न ही बच्चों के सर्वांगीण विकास की कल्पना की जा सकती है।
एक ओर सरकार डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट क्लास और विकसित भारत का सपना दिखा रही है, वहीं दूसरी ओर मंडला जिले के इस गांव की तस्वीरें शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत बयां कर रही हैं। *"पढ़ेगा इंडिया, तभी तो बढ़ेगा इंडिया"* का नारा यहां आकर मानो सवाल बन जाता है। तो वहीं सिंघनपूरी के और देश के नौनिहाल सिस्टम से पूछ रहे हैं..*"झोपड़ी में पढ़ेगा इंडिया, तो आखिर कितना बढ़ेगा इंडिया?"*
ग्रामीणों का कहना है कि जर्जर भवन की जानकारी कई बार संबंधित विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों को दी गई, लेकिन आज तक स्थायी समाधान नहीं निकला। स्थानीय जनप्रतिनिधियों, शिक्षा विभाग के अधिकारियों और जिम्मेदार जिले से लेकर प्रदेश और देश की राजनीति करने वाले जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण बच्चों का भविष्य संकट में है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब शिक्षा को मौलिक अधिकार माना गया है, तब आखिर इन बच्चों को सम्मानजनक और सुरक्षित विद्यालय भवन क्यों नहीं मिल पा रहा है? क्या जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि अब भी इस गंभीर समस्या पर ध्यान देंगे या फिर यह झोपड़ी में ही आने वाली पीढ़ी की किस्मत लिखती रहेगी?
अब जिले के प्रशासन, शिक्षा विभाग और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर सबकी नजर है। यदि शीघ्र ही नया भवन उपलब्ध नहीं कराया गया तो यह केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बड़ी विफलता मानी जाएगी।
*"विकसित भारत की वीआईपी झोपड़ी"*
लगता है सिंघनपुरी का यह स्कूल शिक्षा विभाग का नया "मॉडल स्कूल" है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां स्मार्ट क्लास की जगह झोपड़ी है, एयर कंडीशनर की जगह टूटी फूटी छप्पर से आने वाली हवा के भरोसे पढ़ाई है और पांच अलग-अलग कक्षाओं की जगह एक ही कमरा है।
शायद जिले के जिम्मेदार अधिकारियों ने भी यह सोच कर रखा होगा कि जब बच्चे एक साथ बैठेंगे तो *"एक भारत, श्रेष्ठ भारत"* का नारा और संदेश भी मिल जाएगा। किताबें कम पड़ जाएं तो कोई बात नहीं, जगह कम पड़े तो भी कोई बात नहीं, बस फाइलों में सब कुछ शानदार दिखना चाहिए।
नेताओं के भाषणों में *"विकसित भारत"* दौड़ रहा है, लेकिन सिंघनपुरी के बच्चे अभी भी झोपड़ी से बाहर निकल कर अपने उज्वल भविष्य का रास्ता तलाश रहे हैं। चुनाव आएंगे तो इन्हीं बच्चों को देश का भविष्य बताया जाएगा, मगर आज उनका वर्तमान किसी की प्राथमिकता नहीं है।
कागजों में शायद स्कूल पक्का होगा, योजनाएं पूरी भी होंगी और विकास शत-प्रतिशत भी होगा.? केवल एक छोटी-सी समस्या है—जमीन पर स्कूल अब भी झोपड़ी में चल रहा है।
सवाल सिर्फ इतना है कि क्या भविष्य भी फाइलों में ही बनाया जाएगा, या कभी इन मासूम बच्चों के सिर पर भी एक सुरक्षित स्कूल की छत आएगी?
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