मंडला। नर्मदा नदी के तट पर स्थित मंडला की ऐतिहासिक जिला जेल केवल एक कारागार नहीं, बल्कि देश के स्वतंत्रता संग्राम की अमिट यादों को संजोए एक जीवंत धरोहर है। करीब चार एकड़ क्षेत्रफल में फैली यह जेल आज जहां सामान्य कैदियों का ठिकाना है, वहीं अंग्रेजी शासन के दौरान यही परिसर स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष, त्याग और बलिदान का साक्षी रहा था।
इस जेल की सबसे ऐतिहासिक पहचान बैरक नंबर-1 है, जहां मध्य प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल और द्वारका प्रसाद मिश्र ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में भाग लेने के कारण सजा काटी थी। यही नहीं, वर्ष 1975 के आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले मीसा (MISA) बंदियों को भी इसी जेल में रखा गया था।
63 स्वतंत्रता सेनानियों की यादें संजोए है मंडला जेल
जेल परिसर के मुख्य प्रवेश द्वार पर स्वतंत्रता आंदोलन में जेल की यातनाएं झेलने वाले 63 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम एक स्मृति पट्टिका पर अंकित हैं। यह पट्टिका आने वाली पीढ़ियों को उन वीरों के अदम्य साहस और बलिदान की याद दिलाती है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।
1875 में हुई थी जिला जेल की स्थापना
जेल अधीक्षक संजय सहलाम के अनुसार मंडला जिला जेल की स्थापना वर्ष 1875 में हुई थी। प्रारंभ में यह जेल अर्ध-अंडाकार (Semi Circular) स्वरूप में बनाई गई थी। वर्ष 2014 में इसका विस्तार करते हुए तीन नई एल-आकार (L Shape) की बैरकों का निर्माण किया गया, जबकि 2025 में एक और नई बैरक तैयार की गई।
उन्होंने बताया कि पंडित रविशंकर शुक्ल ने 27 नवंबर 1944 से 13 जून 1945 तक तथा द्वारका प्रसाद मिश्र ने 28 जून 1944 से 14 जुलाई 1945 तक इसी जेल में कारावास की सजा भुगती थी।
आजादी की रणनीतियों का भी रहा केंद्र
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मंडला और डिंडोरी एक ही जिला हुआ करते थे। उस समय इस क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों को मंडला, सिवनी और जबलपुर की जेलों में रखा जाता था। मंडला जेल केवल कैद का स्थान नहीं थी, बल्कि यहां अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष की रणनीतियां भी तैयार होती थीं। इन बैरकों में आजादी का सपना संजोया जाता था और देश को स्वतंत्र कराने का संकल्प मजबूत किया जाता था।
आपातकाल में भी लोकतंत्र के सेनानियों का बना ठिकाना
वर्ष 1975 में लागू आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों की आवाज बुलंद करने वाले मीसा बंदियों को भी इसी जेल में रखा गया। इस कारण मंडला जिला जेल स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ भारतीय लोकतंत्र के संघर्ष की भी महत्वपूर्ण साक्षी बन गई।
आदिवासी समाज का रहा महत्वपूर्ण योगदान
आदिवासी बहुल मंडला जिले के अनेक आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों ने भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके परिजनों के अनुसार, कई सेनानियों ने महीनों तक मंडला जेल में यातनाएं झेलीं, लेकिन देश की आजादी के संकल्प से कभी पीछे नहीं हटे।
आज भी प्रेरणा देती हैं जेल की दीवारें
मंडला जिला जेल की पुरानी दीवारें आज भी उन अनगिनत बलिदानों की मूक गवाह हैं, जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने में अपना अमूल्य योगदान दिया। यह ऐतिहासिक जेल हमें याद दिलाती है कि आजादी केवल 15 अगस्त 1947 की एक तारीख नहीं, बल्कि हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष, त्याग और बलिदान की अमर विरासत है।
