जब खेत प्लॉट बन जाते हैं, तब सिर्फ़ ज़मीन नहीं बिकती... भरोसा भी बिकता है
दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला मंडला में एक सवाल हवा में तैर रहा है। यह सवाल किसी एक गांव का नहीं है, किसी एक कॉलोनाइजर का भी नहीं है। सवाल यह है कि क्या खेती की ज़मीन अब सिर्फ़ कागज़ पर खेती की ज़मीन रह गई है?क्योंकि ज़मीन पर जो हो रहा है, वह कुछ और कहानी कहता है।
खेतों की मेड़ें अब प्लॉटों की सीमाएं बन रही हैं। जहां कभी फसल उगती थी, वहां अब "20×40", "30×50" के बोर्ड लग रहे हैं। लोग अपनी जीवनभर की कमाई लेकर पहुंच रहे हैं। उन्हें सपना बेचा जा रहा हैअपने घर का सपना। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह सपना कानूनी भी है?यही सवाल ग्राम आमाडोंगरी की एक जांच रिपोर्ट उठाती है।
रिपोर्ट कहती है कि कृषि भूमि को बिना डायवर्जन, बिना टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (टीएनसीपी) की अनुमति और बिना स्वीकृत ले-आउट के प्लॉटों में बदला गया। रिपोर्ट यह भी दर्ज करती है कि सड़क नहीं, नाली नहीं, पेयजल नहीं, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं का कोई इंतज़ाम नहीं। इसके बावजूद प्लॉट बिक गए।
यानी शिकायत हुई।
जांच हुई।
अधिकारी मौके पर गए।
रिपोर्ट बनी।
उल्लंघन दर्ज हुआ।
फिर...
क्या हुआ?
यही वह जगह है जहां लोकतंत्र अक्सर चुप हो जाता है।
दस्तावेज़ बताते हैं कि कम से कम सात लोगों को प्लॉट बेचे गए। संबंधित लोगों से अनुमति और वैधानिक दस्तावेज़ मांगे गए, लेकिन वे उपलब्ध नहीं कराए गए। इसके बाद कार्रवाई की फाइल किस मेज़ पर जाकर रुक गई, यह जनता नहीं जानती।
और जब जनता नहीं जानती, तब सवाल पैदा होते हैं।
क्या कार्रवाई इसलिए नहीं हुई क्योंकि मामला छोटा था?
या इसलिए नहीं हुई क्योंकि मामला बड़ा था?
मध्यप्रदेश के नियम साफ़ कहते हैं कि कृषि भूमि को कॉलोनी में बदलने से पहले भू-उपयोग परिवर्तन, आवश्यक विभागों की अनुमति और स्वीकृत ले-आउट अनिवार्य हैं। यह सिर्फ़ कागज़ी प्रक्रिया नहीं है। यही प्रक्रिया तय करती है कि भविष्य में वहां सड़क होगी या नहीं, बिजली पहुंचेगी या नहीं, मकान बनाने की अनुमति मिलेगी या नहीं।
लेकिन जब यह सब छोड़कर सीधे प्लॉट बिकने लगें, तब सबसे बड़ा जोखिम किसका होता है?
कॉलोनाइजर का नहीं।
उस खरीदार का, जिसने अपनी जमा-पूंजी लगा दी।
जिसने बैंक से कर्ज़ लिया।
जिसने बच्चों के भविष्य का सपना उस ज़मीन से जोड़ दिया।
अगर कल वही प्लॉट अवैध घोषित हो जाए, तो बुलडोजर सिर्फ़ दीवारों पर नहीं चलता, वह उम्मीदों पर भी चलता है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल प्रशासन से है।
यदि जांच रिपोर्ट में नियमों के उल्लंघन का उल्लेख है तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
यदि कार्रवाई नहीं हुई तो क्या जिले में चल रही दूसरी कॉलोनियों की भी स्थिति ऐसी ही है?
और यदि नहीं है, तो फिर आमाडोंगरी का मामला अपवाद क्यों बन गया?
लोकतंत्र में सरकार की ताकत उसकी कार्रवाई से नहीं, उसकी निष्पक्षता से मापी जाती है।
इसलिए ज़रूरत सिर्फ़ एक मामले की जांच की नहीं है। ज़रूरत पूरे जिले में विकसित निजी कॉलोनियों का सार्वजनिक सत्यापन करने की है। लोगों को यह जानने का अधिकार है कि वे जिस ज़मीन पर अपना घर बनाने जा रहे हैं, वह कानूनी है या सिर्फ़ एक महंगा भ्रम।
क्योंकि घर खरीदने वाला नागरिक सिर्फ़ ज़मीन नहीं खरीदता।
वह अपने जीवन का सबसे बड़ा भरोसा खरीदता है।
और अगर वही भरोसा कागज़ों में अवैध निकल आए, तो नुकसान सिर्फ़ एक परिवार का नहीं होता—व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी होता है।




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