दैनिक रेवाँचल टाईम्स- भोजशाला और ज्ञानवापी का नजराना देकर नजीर पेश करे मुस्लिम समाज
दो अंग्रेजी कहावते हैं “The eyes are useless when the mind is blind” अर्थात् आँखें निरर्थक यदि दिमाग ही सत्य को देखने से इनकार कर दे। और दूजी कहावत है, “Flogging a dead horse” अर्थात् मरे हुए घोड़े को चाबुक मार-मारकर उससे उठने की आशा रखना। ये दोनों ही कहावतें वर्तमान समय में ‘भारतीय मुस्लिम समाज’ पर सटीक बैठती हैं।
धार की वाग्देवी (मां सरस्वती) की पावन धरोहर 'भोजशाला' और साथ-साथ काशीनाथ के ज्ञानवापी मंदिर का मामला आज पुनः मुस्लिम समाज से सौहाद्र की आशा लिए खड़ा है।
मुस्लिम समाज और विशेषतः इस समाज के नेतृत्व का दावा करने वाले नेताओं को क्या यह बात समझ नहीं आती है कि - “इस ऐतिहासिक परिसर पर हिंदू समाज का दावा केवल आस्था पर नहीं, बल्कि अकाट्य ऐतिहासिक और वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित है?”
मुस्लिम समाज के नेता यदि अपनी सियासती स्वार्थों के कारण सही बात नहीं पर पा रहे हैं तो मुल्ला, मौलवी, मुस्लिम स्कालर्स, प्रोफेसर्स, बुद्धिजीवियों को आगे आना चाहिए और भोजशाला व ज्ञानवापी का नजराना थाली में सजाकर हिंदू समाज को सौंपना चाहिए। यदि मुस्लिम नेता और आलिम दोनों ही ऐसा नहीं करते हैं तो फिर बार-बार गंगा जमुनी तहजीब की बात हिंदू और मुस्लिम समाज दोनों को ही बंद कर देनी चाहिए। गंगा-जमुनी तहजीब केवल जुमला नहीं है यह मुस्लिम वर्ग को सिद्ध करने का यह सर्वाधिक सटीक अवसर है।
परमार वंश के महान राजा भोज द्वारा वर्ष 1034 में निर्मित यह संस्कृत पाठशाला और वाग्देवी मंदिर भारतीय ज्ञान परंपरा का एक अनुपम केंद्र था। हाल ही में उच्च न्यायालय के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण ने इस स्थान के मूल स्वरूप को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है।
सर्वेक्षण के दौरान परिसर और उसके मलबे से सनातन धर्म के विभिन्न देवी-देवताओं की खंडित एवं संरक्षित प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। इनमें भगवान गणेश, शिव, विष्णु, ब्रह्मा, माता पार्वती और वाग्देवी (सरस्वती) की अद्भुत कलाकृतियां सम्मिलित हैं। ये मूर्तियां स्पष्ट करती हैं कि यह मूल रूप से एक मंदिर परिसर था।
भोजशाला की दीवारों और स्तंभों पर संस्कृत और प्राकृत भाषा में लिखे गए कई शिलालेख मिले हैं। इनमें संस्कृत व्याकरण (पतंजलि के सूत्र), काव्य और राजा भोज की स्तुति अंकित है। मस्जिदों में अरबी या फारसी के शिलालेख होते हैं, परंतु यहाँ देवनागरी लिपि में खुदे वैदिक मंत्र और व्याकरण के नियम इस स्थान के अकाट्य 'सरस्वती कंठाभरण' (विद्या का मंदिर) होने की पुष्टि करते हैं।
परिसर के स्तंभों, बीम और छतों पर नक्काशीदार कमल, स्वस्तिक, कलश, शंख, कीर्तिमुख और अप्सराओं की आकृतियां उकेरी गई हैं। इस्लामी वास्तुकला में जीवंत आकृतियों का अंकन पूर्णतः वर्जित है, जबकि भोजशाला के कोने-कोने में ये कलाकृतियां बिखरी पड़ी हैं, जो इसके मंदिर होने का जीवंत प्रमाण हैं।
वैज्ञानिक जांच में परिसर के भीतर प्राचीन हवन कुंड और गर्भगृह के स्पष्ट अवशेष मिले हैं। वर्तमान में जो ढांचा मस्जिद के रूप में उपयोग किया जा रहा है, वह वास्तव में मंदिर के ही स्तंभों और सामग्री को उलट-पुलट कर तथा उन्हें क्षतिग्रस्त करके खड़ा किया गया है।
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस मंदिर की मूल अधिष्ठात्री देवी 'वाग्देवी' की प्रतिमा को ब्रिटिश काल में यहाँ से हटाकर लंदन के 'ब्रिटिश म्यूजियम' में रख दिया गया था, जिसके आधार पर भी हिंदू समाज का यह दावा वैश्विक स्तर पर सिद्ध होता है।
इन तमाम वैज्ञानिक और पुरातात्विक तथ्यों के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि धार की भोजशाला पर हिंदू समाज का अधिकार पूरी तरह स्वाभाविक, ऐतिहासिक और न्यायसंगत है। ऐसे में, इस सत्य को नकारकर अदालतों में अपील दर अपील करना केवल समय की बर्बादी और समाज में कटुता बढ़ाने का माध्यम ही बनेगा।
काशी की 'ज्ञानवापी' और धार की 'भोजशाला' दोनों ही स्थानों पर प्रत्यक्ष दिखने वाले पुरातात्विक साक्ष्य चिल्ला-चिल्लाकर सच्चाई बयां कर रहे हैं। सत्य को केवल कानूनी दांव-पेंचों से कुछ समय के लिए टाला जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता। न्यायालय भी अंततः साक्ष्यों और जनभावनाओं के संतुलन पर ही निर्णय देता है। ऐसे में फिर से सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाना "अपनी ही कुल्हाड़ी पर पैर मारने" जैसा है।
मुस्लिम समाज के नेताओं, मुल्ला-मौलवियों, बुद्धिजीवियों यह विचार करना ही चाहिए कि ऐसी हठधर्मिता भला किस काम की? वो क्यों अयोध्या जैसी ज़िद किए रहना चाहते हैं? हठधर्मिता का अंत हमेशा कड़वाहट के साथ होता है, जबकि संवाद का अंत सदैव सम्मान के साथ होता है।
भारतीय मुसलमानों को यह ऐतिहासिक सत्य स्वीकार करना होगा कि उनके पुरखों के जींस और रक्त इस देश की मिट्टी से जुड़े है, किसी विदेशी आक्रांता बाबर या औरंगजेब से नहीं। वे इसी भूमि की संतान हैं। बहुसंख्यक हिंदू समाज ने सदियों तक अपने मानबिंदुओं के विध्वंस को मूक दर्शक बनकर झेला है, और अब स्वतंत्रता के बाद वह अपनी सांस्कृतिक पहचान को पुनः स्थापित करने के लिए आतुर है। ऐसी परिस्थिति में मुस्लिम समाज को कानूनी लड़ाई लड़ने के बजाय एक बड़ा दिल दिखाना चाहिए। हिंदू समाज को 'बड़ा भाई' मानते हुए उन्हें आगे बढ़कर यह कहना चाहिए:
"ये स्थान आपकी आस्था के केंद्र हैं, हम स्वेच्छा से इन पर अपना दावा छोड़ते हैं।"
यह कदम मुस्लिम समाज की कमजोरी नहीं, बल्कि उनके बड़प्पन, सहिष्णुता और कथित 'गंगा-जमुनी तहजीब' का जीवंत उदाहरण बनेगा। जब बड़ा भाई अपने मानबिंदुओं को वापस पाने के लिए संघर्षरत हो, तो छोटे भाई का धर्म अड़चन बनना नहीं, बल्कि ससम्मान मार्ग प्रशस्त करना होता है।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि देश का आम मुसलमान झगड़ा नहीं चाहता। वह अमन, शिक्षा और तरक्की की राह पर चलना चाहता है। परंतु समस्या मुस्लिम समाज के भीतर के उन कट्टरपंथी नेताओं और वोट बैंक की राजनीति करने वाले स्वार्थी तत्वों की है, जो अपनी राजनीतिक दुकानें चमकाने के लिए आम मुसलमानों के मन में अकारण भय पैदा करते हैं। वे यह झूठा डर फैलाते हैं कि "यदि आज एक मस्जिद छोड़ी, तो कल सारी मस्जिदें छीन ली जाएंगी।"
मुस्लिम समाज की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही है कि वह इन चंद सियासी ठेकेदारों के हाथों की कठपुतली बन जाता है। इस समाज को अब आत्ममंथन करना होगा। उन्हें अपनी कमान अड़ियल रुख वाले नेताओं के हाथ से छीनकर प्रगतिशील, शिक्षित और उदारवादी चेहरों को सौंपनी होगी, जो देश की मुख्यधारा के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में विश्वास रखते हों।
उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के फैसले कानून की सीमाओं में बंधे होते हैं, लेकिन दिलों को जोड़ने का काम अदालतें नहीं कर सकतीं। धार और काशी के मामलों में यदि मुस्लिम समाज सुप्रीम कोर्ट न जाकर सीधे हिंदू समाज के संतों और प्रतिनिधियों के साथ बैठकर सौहार्दपूर्ण समझौता कर ले, तो यह पूरे विश्व के समक्ष भारतीय संस्कृति की एक अनुपम मिसाल होगी।
यह अवसर इतिहास को बदलने का है। भारतीय मुस्लिम समाज को कड़वाहट की अपनी पुरानी विरासत को यहीं दफन करना चाहिए। उसे धार व काशी में चीख-चीख कर हिंदू मंदिर होने की घोषणा करते वैज्ञानिक व पुरातात्विक साक्ष्यों को हृदय से स्वीकार कर हिंदू समाज को सम्मानपूर्वक एक नजराना देकर एक नजीर पेश करनी चाहिए।
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
