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दैनिक रेवांचल टाईम्स - एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि आप हमें आषाढ़ शुक्ल एकादशी व्रत की विधि और महिमा के बारे में बताएं. इसमें किस देवता की पूजा होती है? इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं. ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को इस व्रत की महिमा का बखान किया था, वही मैं तुमको बताता हूंं.
सतयुग का समय था, उस समय चक्रवर्ती सम्राट मांधाता का शासन था. उनकी प्रजा सुखी और संपन्न थी. लेकिन एक बार ऐसा समय आया कि उनके राज्य में 3 साल तक अकाल पड़ गया. वर्षा न होने से चारों ओर हाहाकार मच गया. इसकी वजह से धार्मिक कार्य जैसे हवन, यज्ञ, कथा, व्रत, पूजा, पिंडदान आदि में कमी होने लगी. जनता ने सम्राट मांधाता को अपनी पीड़ा बयान की. उनकी बातें सुनकर वह भी दुखी हो गए.
वह राज्य में अकाल की स्थिति से पहले भी काफी दुखी थे. वे सोचने लगे किपंडित उनको किस पाप की वजह से ऐसा दंड मिला है. इससे मुक्ति के लिए वे एक दिन सेना के साथ जंगल की ओर चले गए. वहां उनको अंगिरा ऋषि का आश्रम दिखाई दिया, तो वे अंदर गए और अंगिरा ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया. ऋषि ने राजा से आगमन का कारण पूछा.
तब राजा ने कहा कि वे अपने धर्म का पालन करते हैं और प्रजा की सेवा में कोई कमी नहीं रखते, फिर भी ऐसा दिन देखना पड़ रहा है. आप मुझे इस स्थिति से बाहर निकलने का उपाय बताएं. इस पर अंगिरा ऋषि ने कहा कि सतयुग में छोटे भी पाप का बड़ा दंड भुगतना पड़ता है. इस भीषण अकाल से बचने का एक उपाय है. आप आषाढ़ शुक्ल एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करें. रात्रि में जागरण करके अगले दिन दान आदि क बाद पारण करें. श्रीहरि की कृपा से अकाल मिटेगा, बारिश होगी और फिर आपका राज्य उन्नति करेगा.
राजा मांधाता आश्रम से विदा लेकर अपने राजमहल लौट आए. आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन उन्होंने विधिपूर्वक व्रत रखकर पूजा की. अंगिरा ऋषि के सुझाव के अनुसार, उन्होंने दान और पारण किया. इस व्रत के पुण्य प्रभाव से उनके राज्य में बहुत अच्छी वर्षा हुई और अकाल खत्म हो गया. बारिश होने से उनके राज्य में फिर से सुख और समृद्धि आ गई. उनका राज्य धन और धान्य से भर गया.
*पं मुकेश जोशी 9425947692*
