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Sunday, January 1, 2023

लाखो करोड़ो खर्च फिर भी खुले में शौच को मजबूर लोग माजक बनी स्वस्छ्ता अभियान....





रेवांचल टाईम्स - आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला में जिले के अंतर्गत आने वाले 9 जनपद पंचायत अंतर्गत लगभग 485 ग्राम पंचायत आते हैं जिनमें से अधिकांश ग्राम पंचायतों में लाखों रुपए खर्च कर सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण कराया जा चुका है। अभी भी पंचायतों में धड़ाधड़ नए सार्वजनिक शौचलय बनाए जा रहे हैं, और लगभग पूर्ण भी हो चुके हैं मगर अधिकांश जगहों पर साल भर पहले बन चुके शौचालय एक कौड़ी काम नहीं आ रहे हैं। स्थिति यह है कि अधिकतर पंचायतों में निर्माण पूरा हो जाने के बाद भी कहीं छह माह से तो कही सालभर से ज्यादा का समय हो चुका है लेकिन उपयोग तक नहीं शुरू हो पाया है। अधिकांश शौचालयों में ताला लटक रह है। ऐसे में पंचायतों ने निर्माण होने के बाद उन्हें लावारिश की तरह अपने हाल में छोड़ दिया गया है। ऐसे में शासन के लाखों-करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं लेकिन फायदा लोगों को नहीं मिल पा रहा । 


लाखों रुपए तक हुए खर्च...

नगर से लेकर ग्राम ग्राम में बने सामुदायिक शौचालय के लिए राशि निर्माण पंचायत की आबादी के अनुसार जारी हो रही है। जिसमें तीन लाख रुपए से लेकर पांच लाख रुपए तक एक सामुदायिक शौचालय के लिए राशि दी जा रही है। जिसमें तीन योजना के अभियान के तहत निर्माण हो रहा है। इसमें स्वच्छ भारत मिशन, मनरेगा और 15 वें वित्त तीनों की राशि शामिल है। अधिकांश जगहों पर पंचायत ही निर्माण एजेंसी है। ऐसे में पंचायत निर्माण तो करा रही है पर उपयोग करने कोई ध्यान नहीं दे रही।


नहीं हो रही नियमित सफाई...

वही एक ओर ग्राम पंचायत में बनाये गये अधिकांश सार्वजनिक शौचालय निर्माण के बाद से ही बंद पड़े है तो वही दूसरी ओर जहां पर शौचालय प्रारंभ हुए है वहां पर भी नियमित सफाई नहीं होने के कारण गदंगी भरी पड़ी है। कई शौचालय तो ऐसे है जहां पर नल तो लगे है पर उन नलों से पानी नहीं आ रहा है जिसका जीता जाता प्रमाण पलारी चौराहे में बनाया गया सार्वजनिक शौचालय है। पानी के अभाव में शौचालय में गंदी हो रही है।


आज भी खुले में शौच को विवश लोगः 

      ग्राम पंचायतों में बने शौचालय बनने के बाद ताला लगा दिया गया है। इसमें एक दिन भी जरूरतमंद को जाने का मौका नहीं मिला। लोग खुले में शौच जाने को विवश है। बारिश में तो बाहर जाना खतरनाक भी है क्योंकि वैशीले जीव जंतुओं का खतरा रहना है। वही, जिम्मेदार अधिकारी गांवों को जाना और जन सुविधाओं समस्याओं को जानना नहीं चाहते। इन शौचालयों को बने कई माह बीत चुके है। लेकिन अभी तक इन शौचालय को चालू नहीं किया जा सका है। दिखावा बन गया शौचालय अभियान


वही ग्रामीणों की माने तो सामुदायिक शौचालयों मात्र दिखावा बन कर रह गया है। स्थानीय लोगों को यह मालूम नही है कि शौचालय आखिर बंद क्यों है। स्वच्छता अभियान पर जोर देते हुए गांव को खुले में शौच मुक्त करने के लिए सार्वजनिक सामुदायिक शौचालयों का निर्माण कराया गया था लेकिन इसका उपयोग नहीं हो रहा है। सामुदायिक शौचालय का निर्माण होने से लोगों में आस जगी थी कि अब खुले में शौच से मुक्ति मिल जाएगी, पर ऐसा नहीं हुआ।


तीन से पांच लाख रुपए लागत होने के बावजूद अधिकांश जगहों पर शौचालय का निर्माण मानकों को ताक पर रखकर किया गया है जिससे उपयोग शुरू होने से पहले ही जर्जर होने की स्थिति में पहुंच गए है। पंचायत के सरपंच-सचिवों के द्वारा निर्माण में जमकर न्यास-वारा किया गया है और जैसे मन चाहा है वैसे निर्माण कार्य करवा दिया गया है। निर्माण होने के बाद अभी तक ताला लटक रहा है। सरकारी योजनाओं की राशि का आखिर किस तरह का बंदरबांट किया जाता है। ये इस जिले के  ग्राम पंचायत से लेकर सांसद है तक जिम्मदारों से पूछना चाहिए कि सरकार की राशि का क्या सही उपयोग हो रहा है जो राशि मूलभुत सुविधाएं लोगो को मिल पा रही हैं आधे से ज्यादा योजनाएं तो कागजों में पूर्ण कर अपनी जिम्मेदारी से पलडा झाड़ते नजर आते है।

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