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Saturday, August 20, 2022

"सेंसेशनल जंगल" प्रदर्शनी का दिल्ली में शुभारंभ आज, मंडला के चित्रकार आशीष कछवाहा के चित्र होंगे प्रदर्शित...





रेवांचल टाईम्स - मंडला के चित्रकार आशीष कछवाहा के चित्रों की प्रदर्शनी का आयोजन नई दिल्ली में किया जा रहा है। "सेंसेशनल जंगल" शीर्षक से त्रिवेणी गैलरी, त्रिवेणी कला संगम 205,  तानसेन मार्ग, नई दिल्ली में इस प्रदर्शनी का शुभारम्भ 21 अगस्त 2022 की शाम 6 बजे होगा। यह प्रदर्शनी 31 अगस्त तक चलेगी। इस प्रदर्शनी का आयोजन मशहूर चित्रकार सैयद हैदर रज़ा की जन्म शताब्दी के अवसर पर रज़ा फाउंडेशन द्वारा किया गया है। कलाकार आशीष कछवाहा ने बताया कि यह उनके लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि है कि देश की राजधानी में उनकी एकल प्रदर्शनी आयोजित हो रही है। इसके पहले भी उनके चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित हो चुकी है लेकिन वो सामूहिक प्रदर्शनियों में अन्य चित्रकारों के साथ। यह पहला मौका है जब उनके चित्रों की एकल प्रदर्शनी आयोजित हो रही है। उन्होंने इसका श्रेय रज़ा फाउंडेशन को देते हुए कहा यह रज़ा फाउंडेशन की वजह से ही संभव हो प् रहा है। अपने चित्रों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इस प्रदर्शनी के लिए ख़ास सीरीज तैयार की है। वो वैसे तो बाघ, वन और बैगा पर ही काम करते है लेकिन इस बार इसी थीम पर नया प्रयोग भी  किया है। उन्होंने फ्रेम के साथ कैनवास पर जुगलबंदी की है। यह कला की दुनिया में एक दम नया प्रयोग है। इसके जरिये उन्होंने सन्देश देने की कोशिश की है कि बेशक वो छोटे शहर से आते है लेकिन वो मॉडर्न आर्ट की दुनिया में वैश्विक सोच के साथ कदमताल करने को तैयार है। उनके साथ सोनसाय बैगा भी दिल्ली गए हुए है। आशीष का कहना है कि वे अपने चित्रों में बैगा को दिखाते है इसलिए वो उन्हें अपने साथ ले गए है कि खुद अपने और अपने संस्कृति व मान्यताओं के बारे में बता सके।


आशीष कछवाहा का जन्म मध्य प्रदेश के मंडला नगर में 8 अगस्त सन 1978 में हुआ था। इनकी प्राथमिक शिक्षा मंडला नगर के ही एक विद्यालय में हुई, जहां के एक शिक्षक ने सबसे पहले इन की कला छमता को पहचाना और इन्हें जिला स्तरीय "नेहरु बाल कला प्रतियोगिता" सन 1988 में भाग लेने भेजा जहां इन्हें दूसरा स्थान मिला। इस घटना ने आशीष को कला की और मोड़ दिया। घर की परिस्थितियों के कारण इन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनी पड़ी। अपने चचेरे भाई मूर्तिकार कृष्ण हरी कछवाहा से इन्होंने कला का मार्गदर्शन प्राप्त किया तथा अपनी कला यात्रा को आगे बढ़ाया। आशीष ने कला के क्षेत्र में किसी भी प्रकार का शिक्षण या प्रशिक्षण प्राप्त नहीं लिया बल्कि स्वाध्याय को ही अपना गुरु मानकर कला कर्म किया। इसके बाद वर्ष 2000 में वह अपने साथी कलाकार मनोज दिवेदी के साथ जिला पंचायत मंडला की एक योजना के तहत कान्हा नेशनल पार्क के ग्राम खटिया पहुंच गए। यहां इन्होंने "आरण्यक एंपोरियम" नामक क्राफ्ट एंपोरियम की स्थापना में साथ दिया।  इन के मन में बचपन से ही वनों, वन्यप्राणियों तथा बैगा आदिवासी जनजीवन को जानने समझने की विशेष रूचि थी, यही वजह रही कि इन्होंने कान्हा के ग्राम खटिया को अपनी कर्म भूमि के रुप में चुना। कान्हा में रहकर वे बैगा जनजीवन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने एंपोरियाम छोड़कर बैगा आदिवासियों के बीच में ही झोपड़ी बनाकर रहने लगे तथा अपनी कला के माध्यम से बैगा जनजीवन को दुनिया के सामने लाने का प्रयास करने लगे। "बाघ वन और  बैगा" का आपस में क्या तालमेल है, यह कान्हा में आने वाले पर्यटकों से साझा करते हैं। पिछले 22 वर्षों से आशीष बैगा आदिवासियों के बीच रहकर उनकी विलुप्त होती संस्कृति को बचाने का प्रयास कर रहे हैं।

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