रेवांचल टाइम्स: पोला का त्यौहार मुख्यतौर पर महाराष्ट्र में मनाया जाता है. यह त्यौहार पोला मोठा, तनहा पोला, बैल पोला आदि के नाम से जाना जाता है. वहीं तिथि के अनुसार इस त्यौहार को पिठोरी अमावस्या के नाम से भी जानते हैं. इस दिन बैलों की पूजा की जाती है. साथ ही बच्चों के लिए मिट्टी का या लकड़ी का घोड़ा तैयार किया जाता है. बच्चे उस घोड़े के साथ घर-घर जाकर गिफ्ट और पैसे लेकर आते हैं. ऐसे में इस त्यौहार को मनाने के पीछे का कारण और महत्व के बारे में पता होना जरूरी है. आज का हमारा लेख इसी विषय पर है. आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि इस त्योहार को मनाने के पीछे क्या कारण है. पढ़ते हैं आगे…
पोला पर्व को मनाने का कारण
जब धरती पर कृष्ण जी के अवतार के रूप में भगवान विष्णु धरती पर आए तो उनका जन्म जन्माष्टमी के दिन हुआ. इस बारे में जब कंस को पता चला तो उसने श्री कृष्ण को मारने के लिए कई योजनाएं बनाईं और अनेकों असुरों को भेजा. इन्हीं असुरों में से एक था पोलासुर. श्री कृष्ण ने अपनी लीलाओं से राक्षस पोलासुर का वध कर दिया. यही कारण है कि इस दिन को पोला कहा जाने लगा. चुकि श्री कृष्ण ने भाद्रपद की अमावस्या तिथि के दिन पोलासुर का वध किया था इसलिए पोला पर्व मनाया जाता है.
बैल पोला पर्व मनाने का तरीका
आज के दिन बैलों और गायों को रस्सी से खोल दिया जाता है और उनके पूरे शरीर में सरसों का तेल और हल्दी लगाई जाती है. इसके बाद उन्हें अच्छे से नहलाया जाता है. उसके बाद सजाकर उनके गले में घंटी पहनाई जाती है. जो लोग अपने साथ बैल और गाय लेकर आते हैं उन्हें भी कॉपी के रूप में कपड़े और धातु के छल्ले दिए जाते हैं.
नोट – इस लेख में दी गई जानकारी मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है.रेवांचल टाइम्स इसकी पुष्टि नहीं करता है. अधिक जानकारी के लिए एक्सपर्ट से संपर्क करें.

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