BREAKING
जवाहर नवोदय विद्यालय से दो छात्र लापता | एमपी में बड़ा प्रशासनिक फैसला | जबलपुर में सनसनीखेज वारदात
कपड़े की गुड़िया की शव यात्रा निकालकर करते हैं अंतिम संस्कार....जानें क्या हैं वज़ह - revanchal times new

revanchal times new

निष्पक्ष एवं सत्य का प्रवर्तक

Breaking

aaj ka akhbar padhen

आज का ई-पेपर

पूरा अखबार पढ़ने के लिए नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करें।

ई-पेपर Viewer

Monday, July 19, 2021

कपड़े की गुड़िया की शव यात्रा निकालकर करते हैं अंतिम संस्कार....जानें क्या हैं वज़ह



भले ही प्रदेश का बड़ा हिस्सा मानसून से भीग गया हो लेकिन पूरे राज्य के लिए अन्न उगाने वाला श्रीगंगानगर अब भी सूखा है। मौसम विभाग की भविष्यवाणी बरसात का औसत समय बता चुकी लेकिन वह समय भी बीत गया और बरसात नहीं हुई। अब ग्रामीण अंचल के किसान बरसात के लिए 'गुड्‌डी फूंकने' की परम्परा निभा रहे हैं। क्या है 'गुड्डी फूंकना' वैसे तो जिला नहरी पानी वाला है, लेकिन जब नहरों में पर्याप्त पानी नहीं आता तो किसान टोटकों का सहारा लेता है। इसी में से एक टाेटका है 'गुड्डी फूंकना'। इसमें किसान परिवार की पीहर आई बेटियां पांच से सात दिन तक पंजाबी गिद्धा करती हैं और गीत गाती है । इस दौरान कपड़े के टुकड़ों से गुड़िया बनाई जाती है। इसका शृंगार किया जाता है, इसके बाद सजती है गुड़िया की अर्थी। मान्यता है कि गुड़िया की अर्थी निकालकर अंतिम संस्कार कर देने से वर्षा जरूर हाेती है।



अर्थी निकालते हुए गाते हैं गीत गुड़िया की इस शव यात्रा में गीत गाए जाते है । "गुड्डी मरगी जाण के, पौड़ी थल्ले आनके", "गुड्‌डी मरगी अज कूड़े, सिरहाने धरगी छज्ज कूड़े" आदि गीतों के साथ गुड़िया की यह अर्थी खेतो में ले जाई जाती है। वहां राेने का स्वांग होता है जिसे पंजाबी लोग स्यापा करते हैं। यहां विधिवत गुड़िया को चिता में रखकर अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। अंतिम संस्कार केबाद बंटता है प्रसाद अंति्म संस्कार के बाद गुलगुलों का प्रसाद बांटा जाता है। इसके तीसरे दिन चिता से गुड़िया की अस्थियां चुनकर इसे नहर में डाल दिया जाता है और एक बार फिर फूल मखाने और बताशों का प्रसाद बांटा जाता है। लंबे समय से चलती आ रही है परम्परा गांव सोलह-सत्रह एच घनजातियां की वृद्ध महिला मंजीत कौर बताती हैं कि इलाका पंजाबी बहुल है। यहां नवविवाहित बेटियां अपने पीहर के गांव में वर्षा के लिए गुड्डी फूंकने की यह परम्परा निभाती हैं। यह लंबे समय से चली आ रही परम्परा है ।

गांव की युवतियों मनजीत कौर, सुखप्रीत कौर, कुलदीप कौर, सुरेंद्र कौर, चरणजीत कौर, गुरमीत कौर आदि ने बताया कि उन्होंने हाल ही में यह परम्परा निभाई है और आसपास के गांवों में कुछ वर्षा हाेनी शुरू हुई है । कहीं बांटते हैं चावल तो कहीं चने इलाके में गुड्‌डी फूंकने के अलावा कई अन्य जतन भी किए जाते हैं जिससे कि इंद्रदेव प्रसन्न हो। गांव गोलूवाला निवादान में पिछले दिनों बरसात के लिए मीठे चावल बांटे गए और ठंडे पानी की छबील लगाई गई। वहीं बरसात के लिए जिले में कई जगह लंगर लगाने और उबले चनों का प्रसाद बांटने की परम्परा है।

No comments:

Post a Comment