रेवांचल टाइम्स :- कोरोना वायरस के बढ़ते संकम्रण को रोकने के लिए कोरोना कर्फ्यू (लॉकडाउन) की समयसीमा 30 अप्रैल तक बढ़ाए जाने के बाद से दिहाड़ी मजदूर और निम्न वर्गों के लोगों में चिंता बढ़ गई है. अगर इसी तरह निरंतर कोरोना कर्फ्यू बढ़ाया गया तो नगर के इन वर्गों के लोगों को भोजन एवं रोजाना दिनचर्या में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं को प्राप्त करने में अधिक परेशानी का सामना करना पड़ेगा और दिहाड़ी मजदूरों की बढ़ती समस्याओं का समाधान नहीं किया जा पाएगा , तो नगर के दिहाड़ी मजदूर और निम्न वर्ग पर गरीबी बढ़ने और भुखमरी का खतरा बढ़ सकता है.
‘महत्वपूर्ण बात ये है कि मंडला जिले में गरीब परिवार , दिहाड़ी मजदूरों और निम्न वर्ग की एक अच्छी खासी संख्या घरों पर बैठी हुई है जिनके कमाई के साधन बंद हो चुके हैं ऐसे में जमा पूंजी का भी कोई सहारा नहीं है ऐसे में यह कोरोना इन लोगों के लिए अभिशाप बन गया है।
ऐसे कई परिवार है जिनके पास राशन कार्ड नहीं है उनके राशन कार्ड के लिए दिए गए आवेदन लंबित हैं. इसके अलावा बड़ी संख्या में आवेदन सत्यापन की प्रकिया में पड़े हुए हुए हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि जिम्मेदार स्थानीय अधिकारी किसी भी गलती से बचने की कोशिश करते हैं ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी न हो सके.’
नैनपुर के आसपास के क्षेत्रों में कामगारों की बहुत बड़ी आबादी है. ये मजदूर ज्यादातर दिहाड़ी पर काम करते हैं. कुछ जगहों पर हर सप्ताह मज़दूरी मिलती है. जो दिहाड़ी मिलती है वह अमूमन काफी कम होती है.
इससे मज़दूरों का गुज़ारा बड़ी मुश्किल से हो पाता है. खाना, रहना और कपड़े का ख़र्च ही पूरा नहीं हो पाता, बचत की बात तो दूर की कौड़ी है.भारत में ज्यादातर मासिक वेतन वाले लोगों के भी लिए बचत करना आसान नहीं है. ऐसे में वह किसी भी प्रकार कि कोई बचत नहीं कर पाते जिससे विषम परिस्थिति में उस बचत किए हुए धन का लाभ लिया जाए तो फिर इस समय यदि वह दिहाड़ी मजदूर या छोटे व्यापारी जैसे मनिहारी दुकान, पान दुकान, छोटे-मोटे होटल, चाय दुकान, जैसे कई अन्य लघु उद्योग करने वाले लोगों पर यह कर्फ्यू कहर बनकर टूटा है
लॉकडाउन को लगभग 2 सप्ताह हो गए हैं और इस बीच दिहाड़ी मज़दूरों एवं निर्मम वर्ग के परिवारों के हालात पर काफी चिंता जताई जा रही है. यह स्वाभाविक ही है क्योंकि लॉकडाउन की वजह से उन्हें काम नहीं मिल रहा है. उनकी कमाई ख़त्म हो गई है.
आप सोच सकते हैं कि लॉकडाउन के इन दिनों में जब हर महीने वेतन पाने वाले लोगों (चाहे वे निजी क्षेत्र में काम कर रहे हों या सार्वजनिक क्षेत्र में) को भी रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरी करने के लिए अपनी बचत में हाथ डालना पड़ रहा हो तो इन मज़दूरों निम्न वर्ग के परिवारों पर क्या बीत रही होगी?
इसमें कोई दो मत नहीं है कि इस बढ़ाए गए कर्फ्यू के दौरान सबसे ज्यादा आर्थिक और भावनात्मक दिक्कतों का सामना कोई करेगा तो वह है रोज़ कमा कर खाने वाले मज़दूर एवं निम्न वर्ग के परिवार .
यह बात सौ फ़ीसदी सच है कि लॉकडाउन ने सबसे करारी चोट दिहाड़ी मजदूरों, निम्न वर्ग पर की है लेकिन जिले में वेतनशुदा हजारों कर्मचारियों की स्थिति भी चिंताजनक है. चाहे ये कर्मचारी प्राइवेट सेक्टर में काम कर रहे हों या पब्लिक सेक्टर में.
लोगों की आमदनी और ख़र्चे का अनुपात देखें तो औसतन चार सदस्य वाला एक परिवार चलाने वाले शख़्स की कमाई में बचत करना बेहद मुश्किल है. बेहद कम लोग थोड़ी-बहुत बचत कर पाते हैं. चूंकि निम्न आय वर्ग के ये वेतनशुदा लोग शासन, प्रशासन या कंपनियों के प्रबंधन के सामने संगठित होकर अपनी आवाज़ नहीं उठा पाते हैं इसलिए इनकी दिक्कतें दिखती नहीं हैं.
कोरोना कर्फ्यू (लॉकडाउन) की वजह से कितनी ग़रीबी बढ़ी है इसका अभी कोई आंकड़ा नहीं आया है लेकिन बढ़ती आर्थिक दुर्दशा साफ़ दिख रही है. गांव हो या शहर, बढ़ती ग़रीबी, भुखमरी से बेहाल दिखने लगे हैं. लोगों पर अब धीरे-धीरे कोरोना संकट के साथ-साथ आर्थिक संकट की मार भी पड़ रही है।
कुछ समय बाद इन वर्ग के लोगों
के पास व्यवस्था के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के अलावा कोई और चारा नहीं रह जाये गा. लिहाजा इन वर्ग के लोगों का मानना है कि सरकार को अब लॉकडाउन को शिथिल कर देना चाहिए ताकि आर्थिक गतिविधियां पुनः शुरू हो सकें.
नैनपुर रेवांचल टाइम्स से शालू अली की रिपोर्ट


No comments:
Post a Comment