वर्तमान को नियंत्रित करने के लिए एक अंकुश “आचार्य सभा” - revanchal times new

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Saturday, February 13, 2021

वर्तमान को नियंत्रित करने के लिए एक अंकुश “आचार्य सभा”

 



रेवांचल टाईम्स :- बहुत से मित्र और पाठक निरंतर मुझसे 6-7 फरवरी को वर्धा में हुए मंथन का सम्पूर्ण विवरण चाह रहे है | मैंने किश्तों में कुछ लिखा और कुछ आगे लिखूंगा | वैसे सम्पूर्ण विवरण ही नही, बल्कि अक्षरशः प्रमाणित विवरण उपलब्ध कराने का प्रयास महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य रजनीश कुमार शुक्ल के नेतृत्व में एक टीम कर रही है | सम्पूर्ण वृतांत एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो रहा है | वैसे वर्धा सम्मेलन के मूल में वो राष्ट्रीय सरोकार है, जिससे आज देश का हर नागरिक चिंतित है | इन्ही में से हम कुछ लोग पहले दिल्ली में फिर वर्धा में मिले | जहाँ तक मैं समझा हूँ इन दोनों मंथन के मूल में लोक परिष्कार की भावना ही थी है और रहेगी | देश में कुछ लोगों का स्वभाव हर बात में राजनीति खोजना है| मैं यह नहीं कहता वे गलत हैं, पर अभी उनके अनुमान गलत है |

यह सही है वर्धा मंथन को आशीष देने वाले बाल विजय भाई ने जिस “आचार्य सभा” की बात कही वो वास्तव में आज देश में निरंकुश होती राजनीति को सही दिशा दे सकती है | आज देश की दशा वे सारे लोग चिंतित है जिनके मन  मस्तिष्क में देश के कल्याण का भाव है और वे उसे साकार होते देखना चाहते हैं |

देश की वर्तमान दशा पर आज अमेरिकी युवा कवि अमांडा मोर्गन की कविता के कुछ अंश समीचीन मालूम होते है किसी मित्र ने मुझे पूरी लम्बी कविता का अनुवाद भेजा है | अमेरिका की पृष्ठ भूमि पर लिखी कविता के वे अंश लिख रहा हूँ जिसकी प्रतिध्वनि भारत के वर्तमान माहौल से मेल खाती  हैं |

जब दिन निकलता है,हम अपने आप से पूछते हैं

कि कभी न समाप्त होने वाले अँधेरे की छाया में

हमें रौशनी कहाँ मिल सकती है ?

हम नुकसान साथ लिए चल रहे हैं

हमें वीरता से इस समुद्र को चीर कर पार करना है

हमने यही सीखा है ख़ामोशी हमेशा शांति नहीं होती

और जो नियम और धारणाएं है

जैसे की लोग रहे होते है

हमेशा ठीक वैसे नहीं होते

और इसके पहले हम जान पाते

तब भी, सुबह हमारी होती है

हम किसी तरह इसे मुमकिन करते हैं

किसी तरह हमने यह काम किया और गवाह हैं

एक राष्ट्र जो टूटा नहीं, लेकिन बनने की प्रक्रिया में है

हम राष्ट्र के उत्तराधिकारी है

       इस उद्देश्य को आग में तपा कर हम एकता रच रहे हैं

ताकि रंगों, चरित्रों, संस्कृतियों और मनुष्य निर्णित परिस्थितियों से उपर

एक राष्ट्र को गढ़ सके

और हमारे बीच आज जो है, हम इस पर नजर स्थिर न करें

बल्कि इस पर ध्यान दें,आगे हमारे बीच क्या  हो ?

हम विभाजन को समाप्त करें

क्योंकि हम जानते हैं

कि पहले हमें अपना भविष्य तय करना है, सबसे पहले हम अपने मतभेदों को परे करते हैं |

इस कविता के भाव के आसपास ही तो वर्धा मंथन में सोचा गया | इससे इतर वैसा बिलकुल नहीं कि इससे, कौन मजबूत होगा और कौन कमजोर | राज्य सत्ता आज सबसे उपर है, इससे लोकसभा, राज्य सभा और विधानसभा से पंचायत तक के चुनाव कुत्सित गठजोड़ से हो रहे है, परिणाम लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं दिखते है |इस  पर अंकुश जरूरी है | इस अंकुश  का नाम “आचार्य सभा” हो सकता है |

                                   राकेश दुबे

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