रेवांचल टाईम्स - केंद्र सरकार के द्वारा लाये गए तीन किसान विरोंधी काले कानून के विरुद्ध किसानों के चल रहे आंदोलन व सरकार द्वारा किये जा रवैये से भारत मे संवैधानिक संकट उत्पन्न हो गया है ।सरकार बार बार विवादास्पद कानून बना रही है। सारा समय कानून के क्रियान्वयन सरकार की हठ धर्मिता एवं आंदोलन की भेंट चढ़ गया है।जिस प्रकार से वर्तमान में सरकार कार्य कर रही है इससे देश लगभग 100 साल पीछे हो गया है संविधान की व्याख्या इस कारण से किया जाना अत्यंत आवश्यक है। विचारणीय प्रश्न यह है कि संसद में बहुमत मिल जाने पर जनता के क्या अधिकार होंगे। हमारे पूर्वज जानते थे कि एक समय ऐसा आ सकता है जब ताकतवर लोग जिसमें अपराध की ताकत, दौलत की ताकत एवं धार्मिक उन्माद फैलाकर जनता के अधिकारों का हनन कर सकते हैं !संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था कि भारत एक लोक कल्याणकारी देश होगा उन्होंने संविधान सौपते समय कहा था कि मैं मैंने एक बहुत अच्छा संविधान बनाया है परंतु इसका क्रियान्वयन करने वालों की नियत पर निर्भर है कि वह इसका किस प्रकार उपयोग करते हैं महामहिम जी ऐसा प्रतीत हो रहा है कि देश में आपातकाल लागू हो गया है जनता के पास कोई अधिकार नहीं है ।जबकि भारत के संविधान की प्रस्तावना नीति निर्देशक तत्व मौलिक अधिकार एवं कर्तव्य संसद को मनमानी करने से रोकते हैं। और संसद के कानून बनाने की सीमाएं निर्धारित करते हैं एवं कानून बनाने के मापदंड निर्धारित करते हैं ज्ञापन को जनहित याचिका मानते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश महोदय को भेजकर संविधान की व्याख्या कराई जाए किसी भी राजनीतिक दल को बहुमत प्राप्त हो जाने पर भारतीय संविधान जनता के अधिकार किस प्रकार सुरक्षित करता है क्या संसद किसी भी प्रकार का कानून बना सकती है।
ज्ञापन सौंपते समय प्रमुख रूप से अधिवक्ता अहमद सईद कुरैशी सहित आम आदमी पार्टी के राजेश पटेल, रघुवीर सिंह सनोडिया, माजिद खान, नितिन दुबे ,पर्यावरणविद ईश्वर सिंह राजपूत, मोहम्मद नदीम खान व अन्य उपस्थित रहे।


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