रेवांचल टाइम्स -आदिवासी बाहुल्य और वनाच्छादित मवई का वन क्षेत्र भी बढ़ते हुए प्रदूषण से अछूता नहीं है ।वर्तमान युवा पीढ़ी भी जानबूझकर अनजान बनती जा रही है ।बुद्धिमान समझा जाने वाला मनुष्य जब ना करने योग्य कृत्य करता है ' और ना खाने योग्य खाने लगता है तब सहज ही उसकी बुद्धिमत्ता पर संदेह होता है ।जगह - जगह ऐसे कचरो और बोतलों के ढेर देखे जा सकते हैं । जिसमें घरेलू कचरे से लेकर सादियों , पार्टियों में उपयोग होने वाले प्लास्टिक के डिस्पोजल पन्निया ,और दारू की शीशियो की भरमार है ।अब तो वन क्षेत्र की कल - कल छल - छल करती पवित्र नदियां भी नशेड़ीओ के प्रभाव से मुक्त नहीं है नशेड़ीओ की पार्टी 'पिकनिक और अन्य शौक भी नदियों में हो रहा है नदियों के किनारे डिस्पोजल शीशियां और मुर्गे के अवशेष भी देखने को मिल रहे हैं अपने स्वार्थ को सिद्ध करने वाला मनुष्य अपने साथ-साथ दूसरे के लिए भी मुसीबत को निमंत्रण दे रहा है गलियों घाटो और इधर-उधर बिखरे कांच के टुकड़े किसी भी राहगीर और मूक प्राणियों के लिए खतरनाक हो सकता है ।समय रहते अगर विचार ना किया गया तो यह प्रदूषण बढ़ता ही जाएगा
रेवांचल टाइम्समवई से मदन चक्रवर्ती की रिपोर्ट


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