रेवांचल टाईम्स डेस्क - देश के आम नागरिक से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक देश में चल रहे किसान आन्दोलन को औचित्यपूर्ण मानता है | आज किसान आन्दोलन की कितनी ज़रूरत है इस पर बहस हो सकती है, लेकिन नई कृषि नीति की आवश्यकता को बहुत सालों से महसूस हो रही है और ये तीन नये कानून भी सम्पूर्ण कृषि नीति का पासंग भी नहीं है । देश के औद्योगिक क्षेत्र में जब उदारीकरण का रास्ता खोला गया था तब से ही कृषि को अर्थव्यवस्था में बड़ा भागीदार बनाने की बात शुरू हुई थी जो अब आन्दोलन के रूप में सडक पर है | सही मायने में हरित क्रान्ति के बाद कृषि क्षेत्र में सरकार की तरफ से कोई बड़ा नीतिगत हस्तक्षेप नहीं हुआ जिसकी ज़रूरत बहुत बड़े पैमाने है | जिन 3 नये कानूनों से इसकी पूर्ति करने की कोशिश की गई है, नाकाफी है | एक समग्र कृषि नीति की जरूरत है |
20 दिन बाद केंद्र सरकार के नेता और मंत्री अब भी आन्दोलन को वह गंभीरता से नहीं रहे है | उनके निर्णय फौरी दिख रहे है, स्थायित्व और सम्पूर्ण सोच का अभाव है |जो देनी चाहिये थी। शुरू में तो इस आन्दोलन को भी शाहीन बाग़ जैसा आन्दोलन बताने की कोशिश की गयी, कुछ नेताओं ने इस आन्दोलन को पंजाब से आये किसान आन्दोलनकारियों को खालिस्तानी कहकर बहुत बड़ी भूल भी की है | उन्हें यह समझना चाहिए कि पंजाब का संपन्न किसान राज्य की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन की मुख्यधारा ही होता है ।सत्ताधारी एन डी ए का सबसे पुराना सहयोगी अकाली दल अपनी इज्ज़त बचाने के लिए सरकार से अलग हो गया। किसान आन्दोलन में शामिल एक गुट ने विभिन्न मुक़दमों में जेलों में बंद किये गए लिबरल और वामपंथियों को रिहा करने की मांग भी अपनी लिस्ट में जोड़ दिया । किसान संघर्ष समिति ने उस गुट को तुरंत अपने आन्दोलन से दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया ।
कहने का अर्थ यह है कि पंजाब के आन्दोलनरत किसानों को देशद्रोही सांचे में फिट करने की कोई भी कोशिश बहुत ही गलत राजनीति का उदाहरण बन सकती थी लिहाजा उससे सरकार ने अपने आपको अलग कर लिया । अब फिर बातचीत का सिलिसला शुरू करने की कोशिश चल रही है जो ठीक है क्योंकि इस आन्दोलन को शांत करने का रास्ता बातचीत की गलियों से ही गुजरता है। सच्चाई यह है कि हर आन्दोलन के हल का रास्ता बातचीत से ही होता है। यह सरकार की सोच पर निर्भर करता है कि बातचीत शुरू में ही कर ली जाए या विवाद के बढ़ जाने के बाद की जाये।
अब सबका मानना है कि समस्या का हल तो असली किसान नेताओं से बात करने से ही निकलेगा। अच्छी बात यह है कि बातचीत के वे रास्ते बंद नहीं हुए हैं। इस बीच एक ऐसी खबर आ गयी जिसका किसान आन्दोलन की वापसी पर प्रतिकूल असर हुआ है। करनाल के एक गुरुद्वारा के एक संत बाबा राम सिंह ने सिंघू बार्डर के पास बनाए गए आन्दोलन स्थल पर आत्महत्या कर ली। हालांकि पुलिस आत्महत्या के कारणों की जांच कर रही है लेकिन उन्होंने जो सुसाइड नोट भी लिखा है जिसमें किसान आन्दोलन के साथ हमदर्दी जताई है। किसी संत का आत्महत्या करके आन्दोलन का समर्थन करना एक ऐसा संकेत है जिसे सरकार को फ़ौरन नोटिस करना चाहिए और भाईचारे के माहौल में बातचीत करने की स्वमेव पहल करनी चाहिए।मौजूदा सरकार ने जिस हिम्मत से ये तीन कानून बनाये उससे बढकर उदारता दिखने का समय आ गया है |
उन फैसलों के लेने के पहले ज़रूरी सलाह मशविरा नहीं हुआ। इसे सरकार की चूक मानी जायेगी क्योंकि उसने नीति को बनाने के पहले किसानों के साथ ज़रूरी सलाह नहीं किया। उसी का नतीजा है कि इतना बड़ा आन्दोलन खड़ा हो गया। अब देखा जा रहा है कि सरकार के मंत्री और सत्ताधारी पार्टी के बड़े नेता ग्रामीण क्षेत्रों में चौपाल करके किसानों को साथ लेने की कोशिश कर रहे हैं। अगर यही काम पहले कर लिया गया होता तो न तो आन्दोलन की नौबत आती और न ही सरकार के संसाधनों का इस्तेमाल करके इतने बड़े पैमाने पर लोगों को समझाने बुझाने का अभियान चलाना होता।
राकेश दुबे

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