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Wednesday, November 11, 2020

दीपोत्सव और उसकी मान्यताएं

 


                   

रेवांचल टाईम्स - वर्षा ऋतु आती है धरती को नहला कर उसे हरियाली की सुंदर चादर ओढ़ा कर चली जाती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने बड़ी ही सुंदर चोपाई लिखी है, वर्षा विगत शरद ऋतु आई लछिमन देखहु परम सुहाई वर्षा के पश्चात शरद ऋतु का आगमन और इसी के साथ ही आगमन होता है दीपावली त्यौहार का। यह पर्व दीपों का है , अतः इसे दीपोत्सव भी कहते हैं । कार्तिक मास की अमावस्या की घोर काली रात दीपों की रोशनी से जगमग हो जाती है । इसका महत्व सामाजिक और धार्मिक दोनों ही दृष्टि से है । कहा जाता है कि इस दिन राम लक्ष्मण और सीता लंका पर विजय प्राप्त कर वनवास काल पूर्णोपरांत अयोध्या लौटे थे। जिसकी खुशी में अयोध्या वासियों ने घी के दीप जलाकर उनका स्वागत किया था । दूसरी मान्यता यह है कि समुद्र मंथन के समय 14 रत्न निकाले जाने की कथा भी इससे जुड़ी हुई है । धनतेरस के दिन धन्वंतरि वैद्य की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी। इसलिए इसे धनतेरस कहा जाता है। यम चतुर्दशी को नरकासुर का वध हुआ था इसलिए इसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है । तीसरे दिन कार्तिक मास की अमावस्या को समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी स्वयं अमृत कलश लेकर उत्पन्न हुई थी अतः इसे लक्ष्मी के आगमन का त्यौहार भी कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार किसान जब खेत से गहाई कर अपनी फसल को घर लेकर आता है, इस खुशी में भी इसे धन के आगमन का पर्व कहा जाता है । चौथे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है इस दिन श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली में उठाकर अतिवृष्टि से ब्रज वासियों की रक्षा की थी पांचवे दिन भाई दूज का पर्व होता है इसे यम द्वितीया भी कहा जाता है । पौराणिक मान्यता के अनुसार यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर में भोजन कराया था। भाई एवं बहन के स्नेह एवं सौहाद्र का यह महापर्व है । आर्यावर्त में आदि - अनादि काल से मनाया जाने वाला यह दीपावली का पर्व विभिन्न सामाजिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं और विशिष्ट उद्देश्यों पर आधारित है। यह सभी मानव जाति के लिए सामाजिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक एकता सद्भावना होना सहिष्णुता परोपकार एवं मानव मात्र एक समान का संदेश देता है ।


रेवांचल टाईम्स से मदन चक्रवर्ती की रिपोर्ट

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